शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

विज्ञान-प्रौद्योगिक्याः अध्ययनेन सह संस्कृतस्य अध्ययनमपि आवश्यकम् :

sanskritpravah प्रेसविज्ञप्ति: संस्कृतम् १३/१०/२०२३



 केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयस्य अनौपचारिकसंस्कृतशिक्षणकेन्द्रस्य  उद्घाटने कुलपति:प्रो.शशिकुमारः प्रावोचत्!

प्रेषक: आचार्यदीनदयालशुक्ल:


नवदेहली- विज्ञान-प्रौद्योगिक्याः अध्ययनं कुर्वतां छात्राणां कृते अपि संस्कृतस्य अध्ययनं महत्त्वपूर्णम् अस्ति । संस्कृतविषये ज्ञानं कृत्वा एव वयं विज्ञानप्रौद्योगिक्यां नूतनसंशोधनं कर्तुं शक्नुमः, यतः अस्माकं प्राचीनग्रन्थेषु संस्कृतभाषायां विस्तृतानि वस्तूनि पूर्वमेव उपलभ्यन्ते। एतत् कुलपतिः प्रो.शशिकुमारधीमानः केन्द्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य,नवदेहलीनगरस्य अनौपचारिकसंस्कृतशिक्षणकेन्द्रस्य द्वितीयशैक्षणिकसत्रस्य उद्घाटनसमये हिमाचलप्रदेशतकनीकीविश्वविद्यालये, हमीरपुरे उक्तवान्। 

कुलपतिः अवदत् यत् भारतस्य सर्वा: भाषाः संस्कृतात् उत्पन्नाः। राष्ट्रियशिक्षानीत्याः अन्तर्गतं भारतस्य सर्वासु भाषासु प्रचारार्थं कार्यं क्रियते । कुलपतिः सर्वान् छात्रान् संस्कृताध्ययनार्थम् आहूतवान्। तस्मिन् एव काले  शैक्षणिक-अधिष्ठाता केन्द्राधिकारी च प्रो० जय देवेनोक्तं यत् अस्मिन् सत्रे कक्ष्या: ऑनलाइन-आफलाइन-इत्यत्र च संचालिताः भविष्यन्ति। अनौपचारिकसंस्कृतशिक्षणकेन्द्रे ३१ अक्टोबर् पर्यन्तं प्रवेशार्थम् आनलाइन् आवेदनं कर्तुं शक्नुवन्ति। अस्मिन् अवसरे तकनीकीविश्वविद्यालयस्य प्राध्यापकाः, छात्राश्च उपस्थिताः आसन्।

नौरास्थ राजकीय महाविद्यालयस्य प्राचार्यः मुख्यातिथिरूपेण समुपस्थिता:  डॉ. राजेशशर्म महाभागेनोक्तं यत् संस्कृतं प्रत्येकस्मिन् व्यक्तिषु वर्तते। अद्यत्वेऽपि संस्कृतं जन्मतः मृत्युपर्यन्तं मनुष्यस्य संस्कारैः सह सम्बद्धम् अस्ति । तथापि वयं संस्कृतं व्यवहारे न स्थापयामः, यस्मात् कारणात् अद्यत्वे अपि संस्कृतस्य जागरणार्थं प्रयत्नाः करणीयाः भवन्ति। १६ शती पर्यन्तं भारते सर्वं संस्कृतभाषायां आसीत्, तदनन्तरं बहुकारणात् भारते संस्कृतस्य महत्त्वं न्यूनीकृतम्, परन्तु अद्य पुनः एकवारं संस्कृतस्य उत्थानाय प्रयत्नाः क्रियन्ते।

बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

(बेताल पच्चीसी-चौबीसवीं कहानी)

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माँ-बेटी के बच्चों में क्या रिश्ता हुआ?



किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा, राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।

उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजा को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार, अपने लड़के के साथ घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, "अगर ये स्त्रियाँ मिल जायें तो जायें, तब जिससे चाहो, विवाह कर लेना।"

लड़के ने कहा, "छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।"

साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।

थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, "तुम कौन हो?"

रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के का विवाह रानी से हो गया| इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।

इतना कहकर बेताल बोला, "राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?"

यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।

बेताल यह देखकर बोला, "राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धैर्य और पराक्रम से प्रसन्न हूँ। मैं अब इस शव से निकल जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस शवको सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर समझायें तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।"

इतना कहकर बेताल चला गया और राजा शव को लेकर योगी के पास आया।



समाचारपत्रम्

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विश्वस्य वृत्तान्त: समाचारपत्रम् ११ अक्टोबर २०२३



उच्चारण-स्थानानि (Uccharan Sthaan)

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च्चारण-स्थानानि (Uccharan Sthaan)       


उच्चारणस्थानानि



                           
          क्रम / संस्कृत-सूत्राणि / वर्ण / उच्चारण स्थान/ श्रेणी  


१) अ-कु-ह-विसर्जनीयानां कण्ठः। 
२) इ-चु-य-शानां तालु। 
३) ऋ-टु-र-षाणां मूर्धा। 
४) लृ-तु-ल-सानां दन्ता: । 
५) उ-पु-उपध्मानीयानाम् ओष्ठौ । 
६) ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च । 
७) एदैतौ: कण्ठ-तालु । 
८) ओदौतौ: कण्ठोष्ठम् । 
९) ‘व’ कारस्य दन्तोष्ठम् । 



१) अ-कु-ह-विसर्जनीयानां कण्ठः।
-अकार (अ, आ), कु= कवर्ग ( क, ख, ग, घ, ङ् ), हकार (ह्), और विसर्जनीय (:) का उच्चारण स्थान कंठ और जीभ का निचला भाग  "कंठ्य"  है।


२) इ-चु-य-शानां तालु। 
-इकार (इ, ई ) , चु= चवर्ग ( च, छ, ज, झ, ञ ), यकार (य) और शकार (श) इनका “ तालु और जीभ / तालव्य ” उच्चारण स्थान है।  


३) ऋ-टु-र-षाणां मूर्धा। 
-ऋकार (ऋ), टु = टवर्ग ( ट, ठ, ड, ढ, ण ), रेफ (र) और षकार (ष) इनका “ मूर्धा और जीभ / मूर्धन्य ” उच्चारण स्थान है। 


४) लृ-तु-ल-सानां दन्ता: ।
-लृकार (लृ), तु = तवर्ग ( त, थ, द, ध, न ), लकार (ल) और सकार (स) इनका उच्चारण स्थान “दाँत और जीभ / दंत्य ” है।


५) उ-पु-उपध्मानीयानाम् ओष्ठौ ।
- उकार (उ, ऊ), पु = पवर्ग ( प, फ, ब, भ, म ) और उपध्मानीय इनका उच्चारण स्थान "दोनों होंठ / ओष्ठ्य ” है। 


६) ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च ।
- ञकार (ञ), मकार (म), ङकार (ङ), णकार (ण), नकार (न), अं  इनका उच्चारण स्थान “नासिका” है ।  


७) एदैतौ: कण्ठ-तालु । 
- ए और ऐ का उच्चारण स्थान “कंठ तालु और जीभ / कंठतालव्य” है।


८) ओदौतौ: कण्ठोष्ठम् ।
- ओ और औ का उच्चारण स्थान “कंठ, जीभ और होंठ / कंठोष्ठ्य” है। 
  

९) ‘व’ कारस्य दन्तोष्ठम् ।
-वकार का उच्चारण स्थान “दाँत, जीभ और होंठ / दंतोष्ठ्य” है ।

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१०) जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् ।
-जिह्वामूलीय का उच्चारण स्थान “ जिह्वामूल ” है ।

११) अनुस्वारस्य नासिका ।
-अनुस्वार (ं) का उच्चारण स्थान “ नासिका ” है ।

१२) क, ख इति क-खाभ्यां प्राग् अर्ध-विसर्गसद्दशो जिह्वा-मूलीय: ।
-क, ख से पूर्व अर्ध विसर्ग सद्दश “ जिह्वामूलीय ” कहलाते है ।

१३) प, फ इति प-फाभ्यां प्राग् अर्ध-विसर्ग-सद्दश उपध्मानीय: ।
-प, फ के आगे पूर्व अर्ध विसर्ग सद्दश “ उपध्मानीय ” कहलाते है ।

१४) अं , अ: इति अच् परौ अनुस्वार-विसर्गौ ।
-अनुस्वार और विसर्ग “ अच् ” से परे होते है; जैसे — अं , अ: ।

संस्कृतवर्णविचारः

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संस्कृत व्याकरण (Sanskrit Vyakaran)-


(1) वर्ण,
(2) प्रत्याहार
(3) प्रयत्न

संस्कृत व्याकरण को माहेश्वर शास्त्र भी कहा जाता है।

👉 माहेश्वर का अर्थ है-- *शिव जी*
👉 माहेश्वर सूत्र की संख्या --- *14*

                (1)  वर्ण
संस्कृत में वर्ण दो प्रकार के होते है---
3= *स्वर*
4= *व्यञ्जन*।

🌸👉 *संस्कृत में स्वर*--: ( *अच्*)तीन प्रकार के होते है-----:
1=■ *ह्रस्व स्वर* ( पाँच)---  इसमें एक मात्रा का समय लगता है। *अ , इ , उ , ऋ , लृ*

2=■ *दीर्घ स्वर* (आठ)---: इसमें दो मात्रा ईआ समय लगता है। आ , ई , ऊ , ऋ , ए ,ऐ ,ओ , औ

3= ■ *प्लुत स्वर* --: इसमे तीन मात्रा का समय लगता है।
जैसे--- *हे राम३*
*ओ३म* ।

🌸👉  सस्कृत में व्यञ्जन (हल् ) ----:

व्यञ्जन चार प्रकार के होते है----
1= 👉स्पर्श व्यञ्जन --: *क से म तक* = 25 वर्ण

2= 👉अन्तःस्थ व्यञ्जन ---: *य , र , ल , व*= 4 वर्ण

3= 👉 ऊष्म व्यञ्जन --: *श , ष , स , ह* = 4 वर्ण

4= 👉 संयुक्त व्यञ्जन --: *क्ष , त्र , ज्ञ* = 3 वर्ण

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

            (2)   प्रत्याहार

🌸 *प्रत्याहारों की संख्या* = 42
● *अक् प्रत्याहार*---: अ इ उ ऋ लृ  ।
● *अच् प्रत्याहार* ---:अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ।
● *अट् प्रत्याहार* ---: अ इ उ ऋ  लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र्  ।
● *अण् प्रत्याहार* ---: अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र् ल्  ।
● *इक् प्रत्याहार*----:  इ उ ऋ लृ  ।
● *इच् प्रत्याहार*----: इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ।
● *इण् प्रत्याहार*-----:  इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ ह् य् व् र् ल्   ।
● *उक् प्रत्याहार* ----: उ ऋ लृ  ।
● *एड़् प्रत्याहार* ----: ए ओ  ।
● *एच् प्रत्याहार*----- : ए ओ ऐ औ  ।
● *ऐच् प्रत्याहार* ----- ऐ औ  ।
● *जश् प्रत्याहार* --- : ज् ब् ग् ड् द्   ।
● *यण् प्रत्याहार* ---': य् व् र् ल्   ।
● *शर् प्रत्याहार*-----: श् ष् स्    ।
● *शल् प्रत्याहार* ---- : श्  ष्  स्  ह्  ।
☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆

                       (3) *प्रयत्न*---

👉  " *वर्णों के उच्चारण करने की चेष्टा को ' प्रयत्न ' कहते है।*
👉 प्रयत्न *दो प्रकार* के होते है---:
1= आभ्यान्तर प्रयत्न
2= बाह्य प्रयत्न
■ *आभ्यान्तर प्रयत्न*----:
आभ्यान्तर प्रयत्न *पाँच प्रकार* के होते है----:
☆ *1*= स्पृष्ट ( *स्पर्श*)-----: *क से म तक के वर्ण  ।*
☆ *2*= ईषत् -- स्पृष्ट -----: *य ,र  , ल , व  ।*
☆ *3*= ईषत् -- विवृत ------:  *श  , ष  , स , ह  ।*

☆ *4*=  विवृत ----:
अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ  ।

☆ *संवृत----:
" *इसमें वायु का मार्ग बन्द रहता है । प्रयोग करने में ह्रस्व  " अ " का प्रयत्न संवृत होता है किन्तु शास्त्रीय प्रक्रिया में " अ "  का प्रयत्न विवृत होता है।*
○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○
🌸 *बाह्य प्रयत्न* ------:
👉 उच्चारण की उस चेष्टा को " बाह्य प्रयत्न " कहते है ; जो मुख से वर्ण निकलते समय होती है।
👉 *बाह्य प्रयत्न  -- 11 प्रकार के होते है।*

(1=विवार  2= संवार  3= श्वास 4= नाद 5= घोष 6=:अघोष 7= अल्पप्राण 8= महाप्राण 9= उदात्त 10= अनुदात्त 11= त्वरित  )
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