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सोमवार, 25 मार्च 2024

कादम्बरी की कथा

sanskritpravah                  



कादंबरी की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है।

विदिशा नगरी के राजा थे शुद्रक,जो अत्यंत प्रतापी और कलाविद् थे ।एक दिन प्रातः वे अपनी राज्यसभा में बैठे थे तभी प्रतिहारी ने आदेश प्राप्त कर एक चांडाल कन्या को सभा में प्रवेश कराया । चांडाल कन्या के हाथ में सोने का पिंजरा था ,जिसमें वैशंपायन नाम का शुक था। शुक़ ने अपना दाहिना चरण उठाकर श्लोक द्वारा राजा का अभिवादन किया।
शुक द्वारा राजा शूद्रक के समक्ष कथा का आरंभ - इस शुक के विषय में राजा को महान कौतूहल हुआ और चांडाल कन्या तथा शुक के भोजन एवं विश्राम कर लेने को कहा। शुक ने अपनी कथा सुनाई और बताया कि वह विंध्याटवी में अपने वृद्ध पिता के साथ रहता था ,एक बहेलिए ने अन्य शुकों के साथ उसके पिता का वध कर दिया और नीचे फेक दिया।पिता के पंखों के भीतर छिपकर वह भी नीचे गिरा, किन्तु बच गया।

अपने प्राण बचाने के लिए वह झाड़ियों में छिप गया और बहालिए के जाने के बाद उस मार्ग से जाने वाले ऋषिकुमार हारित उसे दयावश अपने साथ ले कर महर्षि जबिल के आश्रम आये। जाबिल ने अपने शिष्यों को शुक के पूर्व जन्म की कथा कुछ इस प्रकार सुनाई।

जाबिल द्वारा आश्रम के शिष्यों के समक्ष शुक के पूर्वजन्म तथा चंद्रापीड की कथा सुनाना -

उज्जैनी में तारा पीड नाम के राजा थे। उनकी महारानी का नाम विलास्वती था। राजा के महामंत्री का नाम शुकनास और महामंत्री की पत्नी का नाम मनोरमा था।

बहुत दिनों की पूजा अर्चना के बाद राजा तरापीड को पुत्र की प्राप्ति हुई और उसी दिन शूकनास के यहां भी

एक पुत्र ने जन्म लिया ।राजा के पुत्र का नाम चंद्रापी़ड तथा शुखनास के पुत्र का नाम वैशंपायन रखा गया।

दोनों ने साथ साथ गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की। चंदरापीड के गुरुकुल से लौटने पर पिता तारापीड ने उसका युवराजयाभिषेक किया। इस अवसर के पूर्व चंद्रापीड मंत्री शुकनास के पास गया और शुकनास ने एक सारगर्भित उपदेश दिया,जो शुकनासोपदेश नाम से प्रसिद्ध है।अभिषेक के बाद चंद्रापीड दिग्विजय यात्रा पर निकला। अनेक राजाओं को परास्त कर वह हिमालय के निकट विश्राम करने के लिए रुका। एक दिन शिकार खेलने के लिए निकलने पर उसने किन्नर

मिथुन को देखा और उत्सुकता वश उनका पीछा करते हुए बहुत दूर निकल गया।किन्नर मिथुन अदृश्य हो गए ,तब जल की खोज में वह अच्छोद सरोवर के पास पहुंचा। वहां जल पीकर अपने अश्व को बांधकर विश्राम करने लगा तभी उसे वीणा की ध्वनि सुनाई पड़ी, जिसकी खोज करते हुए उसने सरोवर के तट पर स्थित शिव के मंदिर में वीणा बजाकर स्तुति करती हुई एक युवती को देखा।उसे देखकर वह चकित हुआ। युवती उसे अपने आश्रम में ले गई और उसने फल आदि से चंद्रापीड का सत्कार किया। चंद्रापीद के आदरपूर्वक प्रश्न करने पर उस युवती ने, जिसका नाम महाश्वेता था, अपनी कथा इस प्रकार सुनाई।



महाश्वेता द्वारा अपनी कथा सुनाना -

महाश्वेता ने बताया कि वह गंधर्व राज हंस तथा गौरी नाम की अप्सरा की पुत्री हैं।एक दिन वह माता के साथ सरोवर पर अाई तो उसे पुष्प की अद्भुत गन्ध मिली तब उसने एक ऋषिकुमार को देखा जिनके कान के ऊपर अद्भुत गन्ध वाला पुष्प था। साक्षात्कार होते ही दोनों एक दूसरे की ओर प्रेम से आकृष्ट हो गए। ऋषिकुमार का नाम पुंडरीक था। उसके साथ उसका मित्र कपिंजल था। महाश्वेता पुंडरीक से पुष्प लेकर अपने भवन चली आयी, किन्तु पुंडरीक उसके विरह में अतिशय संतप्त हो उठे ।कपिंजल ने महाश्वेता से मिलकर आग्रह किया कि अविलंब पुंडरीक से मिलकर उसके प्राणों को बचा लीजिए।रात्रि को जब उपयुक्त समय देखकर महाश्वेता सरोवर के पास पहुंची तब तक पुंडरीक के जीवन का अंत हो चुका था। महाश्वेता पुंडरीक के शरीर से लिपट कर विलाप करने लगी। उसी समय चंद्रमंडल से एक दिव्य पुरुष निकला और पुंडरीक के शव को लेकर आकाश में चला गया। जाते - जाते उसने महाश्वेता से कहा इससे तुम्हारा अवश्य मिलन होगा। तब से महाश्वेता अपने प्रियतम से मिलने की आशा में भगवान शिव की आराधना में लगी हुई है।



कादंबरी की कथा-

रात्रि में विश्राम के समय महाश्वेता ने चंद्रापीड से अपनी सखी कादंबरी के विषय में बताया कि कादंबरी के विषय में बताया कि कादंबरी गंधर्वराज चित्ररथ की पुत्री है और अपने माता-पिता के बार - बार कहने पर भी विवाह के लिए सहमत नहीं हो रही है। दूसरे दिन महाश्वेता चंद्रापीड को साथ लेकर कादम्बरी से मिलने चली गई। वहां चंद्रापीड को साथ लेकर कादंबरी से मिलने गई। वहां चंद्रापीड और कादंबरी में बातें हुई और वे परस्पर प्रगाढ़ प्रेमबंधन में बन्ध गए।
   कादंबरी से मिलकर वापस महाश्वेता की कुटी में आने पर चंद्रपीड को अपनी सेना मिली और पिता का पत्र मिला, जिसमें उसे तत्काल राजधानी बुलाया गया था। चंद्रापीड ने अपनी पानवाली पत्रलेखा को कादंबरी के पास भेजा और स्वयं राजधानी की ओर चला गया। कुछ दिन बाद पत्रलेखा जब लौटकर राजधानी पहुंची तो उसने चंद्रापीड से कादंबरी की विरहदशा का वर्णन किया।

चंद्रापीड को उसी समय यह सूचना मिली कि उसका मित्र वैशंपायन जो महामंत्री शुकनास का पुत्र था अच्छोद सरोवर में स्नान करने के बाद वहां से लौटना नहीं चाहता, वह वहीं पागल की तरह कुछ ढूंढ़ रहा है।

चंद्रापीड उसे वापस ले आने के लिए चल पड़ा।जब वह महाश्वेता की कुटी में पहुंचा तो उसे रोते हुए पाया। महाश्वेता ने बताया कि एक ब्राह्मण युवक उसके पास आकर प्रणय निवेदन करने लगा, जिस पर कुपित हो कर उसने उसे शुक बनने का शाप दे दिया। वह शुक बन गया तब उसे पता चला कि वह चंद्रपीड का मित्र वैसंपायन था। अपने मित्र से बिछुरने और कादंबरी से मिलने की संभावना होने की दु:ख में चंद्रापीड भी तत्काल निर्जीव होकर भूमि पर गिर पड़ा। उधर कादंबरी यह सुनकर की चंद्रापीड महाश्वेता की कुटी में आए हैं बड़ी आशा से मिलने के लिए अायी, किन्तु उसे उसका शव ही मिला। परम दु:ख से व्यथित होकर वह सती होने के लिए उद्यत हुई, किन्तु एक आकाशवाणी ने उसे आश्वस्त किया कि उसका चंद्रापीड से मिलन होगा। वह चंद्रापीड के मृत शरीर की रखवाली करने लगी। उसी समय पत्रलेखा चंद्रापीड के अश्व को लेकर सरोवर में कूद गई। कुछ समय बाद सरोवर में से एक ब्राह्मण युवक निकला, जो पुंडरीक का मित्र कपिञ्जल था। उसने महाश्वेता को बताया कि पुंडरीक पृथ्वी पर वैसम्पायन शुक के नाम से उत्पन्न हुआ है और वह भी एक ऋषि के शाप से इंद्रायुध नाम का आश्व बन गया था। उसी ने महाश्वेता से यह भी बताया कि उसने जिसे शुक बन जाने शाप दिया था वो और कोई नहीं पुंडरीक था, तब महाश्वेता छाती पीट-पीट कर रोने लगी। कपिञ्जल ने उसे अश्वासन दिया कि अब उसके दुखों का अंत निकट है और वह स्वयं आकाश में चला गया। अपने पुत्रों के मृत्यु का समाचार जानकर राजा तारापीद, महारानी विलास्वाती और महामंत्री ‍‍शुकनास

और उनकी पत्नी मनोरमा भी उस स्थान पर आए। तारपीड वहीं तपस्या में लग गए। मूर्छित कादंबरी होश में आई और चंद्रापीड के शरीर की सेवा में लग गई।



शुक का राजा शुद्रक़ से अपने विषय में बताया -

राजा शुद्रक के समीप चांडालकन्या द्वारा लाए गए शुक ने राजा से अपने विषय में आगे की कथा इस प्रकार बताई - महर्षि जाबिल ने जब अपने शिष्यों को मुझसे संबद्ध जा कथा सुनाई उसे मुझे अपना पूर्वजन्म स्मरण हो आया और मुझे यह ज्ञात हो गया कि मैं ही महामंत्री शुकनास का पुत्र वैशंपायन हूं। जब मेरे पंख निकल आए तब मैं अपने मित्र चंद्रापीड को ढूंढने निकला, किन्तु चांडाल द्वारा पकड़ लिया गया।



चांडाल कन्या द्वारा कथा को पूरी करना -

इसके बाद चांडाल कन्या ने राजा को बताया कि राजा को बताया कि राजा शुद्रक ही चंद्रापीड है। वह स्वयं लक्ष्मी है और वैशंपायन उसका पुत्र है। राजा शुद्रक को अपना पूर्व जन्म याद हो आया। उधर महाश्वेता की कुटी में वसंत छा गया और कादंबरी ने जैसे ही चंद्रापीड के शरीर का आलिंगन किया वह ऐसे जीवित हो उठा जैसे नींद से जागा हो। उसी समय शूद्रक ने भी अपना शरीर त्याग दिया। महाश्वेता की कुटी में कुछ ही क्षण में पुंडरीक अपने मुनिकुमार वाले रूप में प्रकट हुआ और उसका महाश्वेता से मिलन हो गया। सर्वत्र आनंद छा गया।

                     इस प्रकार इस कथा का नायक है चंद्रापीड और नायिका है कादंबरी। सहनायक और सहनायिका हैं - पुंडरीक और महाश्वेता। यह तीन जन्मों को मिली जुली कहानी है,जिसका अधिकांश भाग शुक द्वारा महर्षि ज़ाबिल की कथा के अनुसार शुद्रक से कहा जाता है।

                कादंबरी के आरंभ में बाण ने बीस पद्यों में मंगलाचरण सज्जन की प्रशंसा और दुर्जन की निन्दा, अपने वंश के पूर्वजों का आलंकारिक एवं मनोरम वर्णन, तथा कथा के गुणों का उल्लेख किया है। चंद्रापीड की तांबूल करक वाहिनी पत्रलेखा, जो चंद्रापीड के चले आने पर भी कादंबरी के पास रह गई थी, लौटकर चंद्रापीड की राजधानी आती है इस वर्णन के साथ ही कादंबरी कथा का पूर्वभाग समाप्त होता है। 





बुधवार, 22 जून 2022

अभिज्ञान शाकुन्तलम् "

 -महाकवि कालिदासस्य जयन्त्याः अवसरे प्रस्तुतिः-'

             "अभिज्ञान शाकुन्तलम् "  

 शाकुन्तलम् महाकवि कालिदासेन विरचितमेकं बहु प्रसिद्धं नाटकम् अस्ति। अस्य नाटकस्य नायकः दुष्यन्तः नायिका शकुन्तला चास्ति। दुष्यन्तः शकुन्तलया सह गान्धर्व-विवाहं कृतवान्, तदा सः स्मृतिचिन्हं नाम अङ्‍गुलीयकं दत्तवान्। तत् अभिज्ञानं मुनेः दुर्वाससः शापेन विलुप्तमभवत्। शापवशात् राजा दुष्यन्तः शकुन्तलां विस्मृतवान्।

तदनन्तरं दुष्यन्तेनापमानिता गर्भवती सा वनाश्रमे निवसन्ती भरतनामकं पुत्रमजनयत् । द्वादशवर्षानन्तरं केनचिद् धीवरेण तदंगुलीयकमभिधानं दुष्यन्तः लब्धवान् । तद् दृष्ट्वैव संपूर्णं पूर्ववृत्तं स्मृतवान्। विरहशोकाकुलः सः शकुन्तलामन्वेष्टुं वने परिभ्रमन् तत्राश्रमे गतवान्। तत्र भरतेन सह शकुन्तला मिलितवती । नाटकस्यास्य विश्वसाहित्येऽत्यधिकं महत्त्वं वर्तते। साहित्यसमीक्षकाः कथयन्ति यत् --

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्य़ा शकुन्तला।

तत्रापि चतुर्थोंकः तत्र श्लोकचतुष्टयम् ।।

अभिज्ञानशाकुन्तलं नाटकस्य मूलकथावस्तु महाभारतात् आदिपर्वणः शकुन्तलोपाख्यानात् 

उद्धृतम् ।

नाटकेऽस्मिन् नायिका शाकुन्तला नायकेन राज्ञा दुष्यन्तेन गान्धर्वविवाहविधिना परिणीता । स्वनगरं प्रति परावर्तमानेन तेन “ एकैकमत्र दिवसे दिवसे मदीयं, नामाक्षरं गणय, गच्छसि यावदन्तम्” ॥ इत्युक्त्वा स्वनामङ्कितमंगुलीयकं स्वयमेव शाकुन्तलायाः हस्ते परिधापितम् । 

इत्यभिज्ञानविषयिणी घटना महाभारतस्यादिपर्वात् गृहीता ।


कथा-

पुरुवंशस्य राजा दुष्यन्तः कदाचित् मृगयां कुर्वन् अटव्यां हरिणं अनुधावन् मालिनीतीरे विद्यमानस्य कण्वस्य आश्रमं प्रविशति । कण्वः फलपुष्पाणि आनेतुं गत इत्यतः काचित् सुन्दरी तापसकन्या तस्मै स्वागतं करोति । अर्घ्यपाद्यादिभिः सत्करोति सा । तस्याः रूपेण मोहितः दुष्यन्तः स्वपरिचयं तस्यै कुर्वन् तां प्रति - त्वं क्षत्रियोऽसि ? त्वां प्रति मम मनः आकर्षति । अहं त्वां कामये इत्यवदत् । शकुन्तला तु - अहं मेनकाविश्वामित्रयोः पुत्री इति, ताभ्यां यदा परित्यक्ताहं शकुन्तपक्षिभिः रक्षिता इति, ततः कण्वमहर्षिः वने मां दृष्ट्वा आश्रमं प्रति आनीय पोषितवान् इति । शकुन्तपक्षिभिः रक्षिता अहं शकुन्तला इति नामधेयं प्राप्नवम्। यदि मां वोढुं वाञ्छसि तर्हि कण्वमहर्षेः अनुमतिः अपेक्षिता इत्यादिकं सर्वं वृत्तान्तम्

अकथयत् ।

दुष्यन्तः तु क्षत्रियाः गान्धर्वविधिना परिणेतुं 

शक्नुवन्ति । तदर्थं कण्वस्य आक्षेपः न स्यादिति, त्वयि जायमानमेव उत्तराधिकारिरूपेण ताम् अङ्गीकारयित्वा तस्याः पुत्रमेव युवराजं करिष्यामि इति प्रतिश्रुण्वानः तां परिणीतवान् । अग्रे तस्यै राजयोग्यानि वेषभूषणानि सेवकद्वारा प्रेषयामि इति उक्त्वा कण्व मम विषये किं वदेत् इति चिन्तयन्नेव स्वनगरं प्रायात्।

कण्वे आश्रमं प्रत्यागते शकुन्तला तस्य शिरसः उपरि विद्यमानं भारम् अवतारयति । तथापि तस्य मुखं अदृष्ट्वा लज्जया अधोमुखी तिष्ठति । कण्वे लज्जायाः कारणं पृच्छति सति शकुन्तला दुश्यन्तेन साकं कृतविवाहवृत्तन्तं अकथयत् । दिव्यदृष्ट्या सर्वविदितः कण्वः - ”वत्से ! त्वया कृतः अधर्मः न । क्षत्रियाणां गान्धर्वविधिना परिणयः सम्मतः” इति समर्थयति । कालक्रमेण गर्भवती शकुन्तला रूपगुणसम्पन्नोपेतं सुतं असूत । पुत्रस्य षट् वर्षाणि अतीतानि चेदपि दुष्यन्तः नागतः । सः अपि आरम्भदिनेषु कण्वः किमपि वदेत् इति चिन्तयन् न प्रवर्तते स्म, क्रमेण शकुन्तलायाः विषयः तेन विस्मृतः । परं सा तु तं निरीक्षमाणा खिद्यते स्म । बालस्तु धीरः सन् वनस्य सर्वप्राणिनः अपि निगृह्य आत्मानं "सर्वदमन" इति परिचाययति स्म । तं यौवराज्याय अर्हं मन्वानः कण्वः मुहूर्तं निश्चित्य स्वशिष्यैः सह शकुन्तलां तत्पुत्रं च दुष्यन्तस्य राजधानीं प्रति प्रेषयामास ।

यदा शकुन्तला पतिगृहं प्रस्थिता तदा पालितपितुः कण्वस्य नेत्रे अश्रुपूर्णे भवतः । तच्छिष्याः तां राजधानीं प्रापय्य प्रत्यागच्छन्ति । पुत्रेण सह शकुन्तला राजसभायां दुष्यन्तं दृष्ट्वा स्ववृत्तान्तं सर्वं निवेदयति । तस्याः वचनेन स्मृतपूर्ववृत्तान्तः राजा अपि लोकापवादात् भीतः अहं किमपि नजाने इति वदति । तामुद्दिश्य - शकुन्तले ! का त्वम् ? कुतः अत्र आगतं त्वया ? किं साहाय्यम् अपेक्षितम् ? इति अपरिचितः इव सम्भाषते । ततः शकुन्तला - "महाराज ! अयं तव पुत्रः । त्वया आश्रमे दत्तवचनानुसारं तव राज्यस्य उत्तराधिकारी भविता । यदा त्वया आश्रमं प्रति आगतं तदा प्रवृत्तं सर्वं स्मर" इत्यादि रीत्या अभियाचते । दुष्यन्तः शकुन्तलां न विस्मृतवान् आसीत् परं तस्मिन् क्षणॆ किमपि अजानन् इव - 

धर्मार्थकामसम्बन्धं न स्मरामि त्वया सह ।

गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद्वापीच्छसि तत् कुरु ॥

अस्य तात्पर्यमेतत् - धर्मार्थकामार्थं त्वया सह सम्बन्धकरणं न मया स्मर्यते । त्वं याहि, अत्रैव तिष्ठ स्वेच्छानुसारं वा कर्म कुरु इति साक्षात् वदति । शकुन्तला अवमानेन लज्जया च पीडिता क्षणं यावत् किङ्कर्तव्यमूढा तिष्ठति । तदा नितरां कुपिता सा दुष्यन्तं सम्यक् निर्भत्सयन्ती- "महाराज ! जानन्नपि कुतः एवं प्रलपसि ? एवम् असत्यं कथयन् त्वं हृदि संस्थितं सर्वसाक्षिणं परमात्मानं मा अवमानय । अहं तव धर्मपत्नी । यदि मां त्यजसि न किमपि दुःखम्, परं एतं तव पुत्रं मा त्यज । मम वचनं यदि उपेक्षसे तर्हि तव शिरः सहस्रशः छिद्रं भविष्यति" इत्यादिभिः वचनैः भर्त्सयति । तथापि दुष्यन्तस्य मनः न द्रवति । पूर्वतनं किमपि न स्मरन् सः अन्ते तामेव "वेश्यापुत्रि !" इति निन्दति । शकुन्तलायाः नयविनयादिभिः याचनादिभिः अपि दुष्यन्तः नाङ्गीकरोति । तदा सा कोपाग्निम् असहमाना पुत्रेण सह ततः निर्गता । तावता - "भरस्व पुत्रं दुष्यन्त ! मावमंस्थाः शकुन्तलाम्" (हे दुष्यन्त ! अयं तव पुत्रः, तं पोषय । शकुन्तलायाः अवमाननं मा कुरु) इति अशरीरवाणी काचित् भविष्यति, शकुन्तलायाः उपरि पुष्पवृष्टिः च भविष्यति । 

ततः दुष्यन्तः सिंहासनात् अवतीर्य अन्तरिक्षदेवताः नमस्कृत्य राजसभायां मन्त्रिपुरोहितं च उद्दिश्य - "अहं तु एतां जाया इति, अयं तव पुत्रः इति सम्यक् एव अभिज्ञातवान् अधुना अशरीरवाणी जाता इत्यतः अयं पुत्रः मदीयः शुद्धः इति निःशङ्कं कथयामि इति वदन् तम् आलिङ्गितवान्, शकुन्तलां च आदरेण सत्कृतवान् । सर्वदमनः युवराजपदे नियुक्तः सन् अग्रे भरतः इति प्रसिद्धिम् अवाप । शकुन्तला पट्टमहिषी सञ्जाता ।

शकुन्तलादुष्यन्तयोः कथा पुराणकाले अतीव प्रसिद्धः स्यात् अतः इयं कथा न केवलं महाभारते, भागवते, विष्णुपुराणे, हरिवंशे, मत्स्यपुराणे, वायुपुराणे, पद्मपुराणे च दृश्यते । बौद्धानां जातककथायामपि शकुन्तलाकथासदृशी अपरा काचित् कथा विद्यते । जैनसम्प्रदायेऽपि (पार्श्वनाथचरित्रम्) कालिदासस्य शाकुन्तलनाटकसदृशी अन्य कथा दृश्यते । एतैः अंशैः शकुन्तलादुष्यन्तयोः कथा अनादिकालात् अपि प्रचलिता इति ज्ञायते ।

कालिदासस्य नाटकस्य कथायाः महाभारते उक्तायाः कथायाः च तुलनां कुर्मः चेत् अत्र कालिदासस्य रचनाकौशल्यम् उदात्तं रचनात्मकं च परिवर्तनं दृश्यते । कालिदासेन ग्रथितस्य अभिज्ञानशाकुन्तलस्य प्रथमाङ्कः कण्वस्य अश्रमस्य दृश्यम् । तस्य आरम्भः अष्टमूर्तेः शिवस्य स्तवनेन भवति । ततः सूत्रधारः नट्या सह रङ्गं प्रविश्य ग्रीष्म-ऋतुवर्णनद्वारा सङ्गीतस्वादम् अनुभवति । नवीनतया रचितस्य कालिदासस्य नाटकस्य परिचयं कारयति । तदनन्तरं दुष्यन्तः हरिणम् अनुधावन् आगच्छन्नस्ति इति घटनां संसूच्य प्रस्तावनं समाप्य निर्गच्छति ।                

ततः दुष्यन्तः कञ्चित् हरिणं अनुधावन् राजा दुष्यन्तः रथं वाहयन् सूतश्च प्रविशतः । दुष्यन्तः यावत् हरिणस्य उपरि बाणं प्रयोक्तुं सिद्धः तावता आश्रमस्य तपस्विनः आगत्य - "राजन् ! आश्रममृगोऽयं मा हन्यताम्" इति वदन्ति । समीपे विद्यमानं कण्वस्य आश्रमं प्रदर्श्य तत्र कण्वः अधुना आश्रमे नास्ति, परं कण्वदुहिता शकुन्तला तव सत्कारं करिष्यति गत्वा अतिथिसत्कारं स्वीकृत्य गच्छ इति सूचयन्ति । दुष्यन्तः स्वयम् एकाकी आश्रमं प्रति गच्छति । तत्रा तिसृभिः तापसकन्यकाभिः वृक्षेभ्यः जलं सिच्यमानम् असीत् । तासां मधुराणि सम्भाषणानि प्रच्छन्नः स्थित्वैव शृणोति । तासु तिसृषु अन्यतमायाः शकुन्तलायाः अप्रतिमं सौन्दर्यं विलोक्य विस्मितः भवति राजा । तस्याः अव्याजमनोहरं सौन्दर्यं स्वदते सः । तासां पुरतः आत्मानं दर्शयितुं समयं प्रतीक्षमाणः भवति । तावता कश्चन भ्रमरः शकुन्तलां पीडयन् भवति । तदा राजा आत्मनः प्रकटनाय अयं समुचितः कालः इति चिन्तयन् तद्दूरीकरणाय सः प्रविशति । तयोः सख्योः सम्भाषणेन शकुन्तला विश्वामित्रमेनकयोः पुत्रीति, ताभ्यां परित्यक्ता शकुन्तपक्षिभिः वने पोषितां तां कण्वमहर्षिः आश्रमं प्रति आनीय तां पोषयन् अस्ति इत्यादिविषयान् ज्ञात्वा राजा सन्तुष्टः भवति ।

एषा क्षत्रियकन्या, 

मया परिणेतुं योग्या इति चिन्तयन् मनसि हृष्टः भवति । 

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

अभिज्ञानशाकुन्तलम् - सप्तमोऽङ्कः-

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सप्तमोऽङ्कः

कालिदासः

  




(ततः प्र-विशति आकाशयानेन रथाधिरुढो राजा मातलिश्च)
राजा- मातले, अनुष्ठितनिदेशोऽपि मघवतः सत्क्रियाविशेषाद्
अनुपयुक्तमिवात्मानं समर्थये ।
मातलिः-(सस्मितम्) आयुष्मन्, उभयमप्यपरितोषम् । कुतः,
प्रथमोपकृतं मरुत्वतः प्रतिपत्त्या लघु मन्यते भवान् ।
गणयत्यवदानविस्मितो भवतः सोऽपि न सत्क्रियागुणान् ॥१॥
राजा- मातले, मा मैवम् । स खलु मनोरथानामप्यभूमिः विसर्जनाव-
सरसत्कारः । मम हि दिवौकसां समक्षमर्धासनोपवेशितस्य –
अन्तर्गतप्रार्थनमन्तिकस्थं जयन्तमुद्वीक्ष्य कृतस्मितेन
आमृष्टवक्षोहरिचन्दनाङ्कः मन्दारमाला हरिणा पिनध्दा ॥२॥
मातलिः- किमिव नामायुष्मान् अमरेश्वरान्नार्हति ! पश्य-
सुखपरस्य हरेरुभयैः मतं त्रिदिवमुद्धृतदानवकण्टकम् ।
तव शरैरधुना नतपर्वभिः पुरुषकेसरिणश्च पुरा नखैः ॥३॥
राजा- अत्र खलु शतक्रतोरेव महिमास्तुल्यः
सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यन्नियोज्याः
संभावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम् ।
किं वाऽभविष्यदरुणास्तमसां विभेत्ता
तं चेत्सहस्रकिरणो धुरि नाकरिष्यत् ॥४॥
मातलिः- सदृशं तवैतत् (स्तोकमन्तरमतीत्य) आयुष्मन्, इतः पश्य
नाकपृष्ठप्रतिष्ठितस्य सौभाग्यमात्मयशसः ।
विच्छित्तिशेषैः सुरसुन्दरीणां वर्णैरमी कल्पलतांशुकेषु ।
विचिन्त्य गीतक्षममर्थजातं दिवौकसस्त्वच्चरितं लिखंति ॥५॥
राजा- मातले, असुरसंप्रहारोत्सुकेन पूर्वेधुर्दिवमधिरोहता मया न लक्षितः
स्वर्गमार्गः । कथमस्मिन् मरुतां पथि वर्तामहे ?
मातलिः-
त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां
ज्योतीषि वर्तयति च प्रविभक्तरश्मिः ।
तस्य व्यपेतरजसः प्रवहस्य वायोः
मार्गो द्वितीयहरिविक्रम पूत एषः ॥६॥
राजा- मातले, अतः खलु सबाह्यान्तः करणो ममान्तरात्मा प्रसीदति
(रथाङ्गमवलोक्य) मेघपदवीमवतीर्णौ स्वः ।
मातलिः- कथमवगम्यते ?
राजा-
अयमरविवरेभ्यश्चातकैर्निष्पतद्भिः
हरिभिरचिरभासां तेजसा चानुलिप्तैः ।
गतमुपरि घनानां वारिगर्भोदराणां
पशुनयति रथस्ते सीकरक्लिन्ननेमिः ॥७॥
मातलिः- क्षणादायुष्मान् स्वाधिकारभूमौ वर्तिष्यते ।
राजा- (अधोऽवलोक्य) मातले, वेगावतरणादाश्चर्यदर्शनः संलक्ष्यते
मनुष्यलोकः । तथा हि –
शैलानामवरोहतीव शिखरादुन्मज्जतां मेदिनी
पर्णाभ्यन्तरलीनतां विजहति स्कन्धोदयात्पादपाः ।
सन्तानैस्तनुभावनष्टसलिला व्यक्तिं भजन्त्यापगाः
केनाप्युत्क्षिपतेव पश्य भुवनं मत्पार्श्वमानीयते ॥८॥
मातलिः- साधु दृष्टम् । (सबहुमानमवलोक्य ) अहो उदाररमणीया पृथ्वी ।
राजा- मातले, कतमोऽयं पूर्वापरसमुद्रावगाढः कनकरसनिस्यन्दी सान्ध्य
इव मेघपरिधः सानुमानालोक्यते ?
मातलिः – एष खलु हेमकूटो नाम किंपुरुष पर्वतः तपस्संसिध्दिक्षेत्रम् ।
पश्य-
स्वायंभुवान्मरीचेर्यः प्रबभूव प्रजापतिः ।
सुरासुरगुरुः सोऽत्र सपत्नीकस्तपस्यति ॥९॥
राजा- तेन ह्यतिक्रमणीयानि श्रेयांसि । प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्तं
गन्तुमिच्छामि ।
मातलिः- प्रथमः कल्पः !
राजा- (सस्मितम्)
उपोढशब्दा न रथाङ्गनेमयः
प्रवर्तमानं न च दृश्यते रजः ।
अभूतलस्पर्शतयाऽनिरुध्दत-
स्तवावतीर्णोऽपि रथो न लक्ष्यते ॥१०॥
मातलिः- एतावानेव शतक्रतोरायुष्मतश्च विशेषः ।
राजा- मातले, कतमस्मिन् प्रदेशे मारीचाश्रमः ?
मातलिः- (हस्तेन दर्शयन्) पश्य !
वल्मीकार्धनिमग्नमूर्तिरुरसा सन्दष्टसर्पत्वचा
कण्ठे जीर्णलताप्रतानवलयेनात्यर्थसंपीडितः ।
अंसव्यापि शकुन्तनीडनिचितं विभ्रज्जटामण्डलं
यत्र स्थाणुरिवाचलो मुनिरसावभ्यर्कबिम्बं स्थितः ॥११॥
राजा- नमस्ते कष्टतपसे !
मातलिः- (संयतप्रग्रहं रथं कृत्वा) एतौ अदितिपरिवर्धितमन्दारवृक्षं
प्रजापतेराश्रमं प्रविष्टौ स्वः ।
राजा- स्वर्गादधिकतरं निर्वृतिस्थानम् । अमृतहृदमिवावगाढोऽस्मि ।
मातलिः- (रथं स्थापयित्वा) अवतरत्वायुष्मान् ।
राजा- (अवतीर्य मातले, भवान् कथमिदानीम् ?
मातलिः- संयन्त्रितो मया रथः । वयमप्यवतरामः (तथा कृत्वा) इत
आयुष्मन् । (परिक्रम्य) दृश्यन्तामत्रभवतामृषीणां तपोवनभूमयः ।
राजा- ननु विस्मयादवलोकयामि ।
प्राणानामनिलेन वृत्तिरुचिता सत्कल्पवृक्षो वने
तोये काञ्चनपद्मरेणुकपिशे धर्माभिषेकक्रिया ।
ध्यानं सत्नशिलातलेषु विबुधस्त्रीसन्निधौ संयमो
यत्काङ्क्षन्ति तपोभिरन्यमुनयस्तस्मिंस्तपस्यन्त्यमी ॥१२॥
मातलिः- उत्सर्पिणी खलु महतां प्रार्थना । (परिक्रम्य, आकाशे) अये
वृध्दशाकल्य किमनुतिष्ठति भगवान् मारीचः ? किं व्रवीषि-
“ दाक्षायण्या पतिव्रताधर्ममधिकृत्य पृष्टस्तस्यै महर्षिपत्नी सहितायै
कथयति” इति ?
राजा- (कर्णं दत्वा), अये प्रतिपाल्यावसरः खलु प्रस्तावः ।
मातलिः- (राजानमवलोक्य) अस्मिन्नशोकवृक्षमूले तावदास्ताम् आयुष्मान्
यावत्त्वामिन्द्रगुरवे निवेदयितुमन्तरान्वेषी भवामि ।
राजा- यथा भवान् मन्यते ।
मातलिः- आयुष्मन्, साधयाम्यहम् । (इति निष्क्रान्तः)
राजा- (निमित्तं सूचयित्वा)-
मनोरथाय नाशंसे किं बाहो स्पन्दसे वृथा ।
पूर्वावधीरितं श्रेयो दुःखं हि परिवर्तते ॥१३॥
(नेपथ्ये) मा खलु चापलं कुरु । कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम् ?
राजा- (कर्णं दत्वा) अभूमिरियमविनयस्य । को नु खल्वेष निषिध्यते ?
(शब्दानुसारेणावलोक्य, सविस्मयम्) अये को नु खल्वयम्
अनुबध्यमानस्तपस्विनीभ्यामबालसत्त्वो बालः ?
अर्धपीतस्तनं मातुरमर्दक्लिष्टकेसरम् ।
प्रकीडितुं सिंहशिशुं बलात्कारेण कर्षति ॥१४॥
(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टकर्मो तपस्विनीभ्यां बालः )
बालः- जृम्भस्व सिंह, दन्तास्ते गणयिष्ये ।
प्रथमा- अविनीत किं नोऽपत्यनिर्विशॆषाणि सत्वानि विप्रकरोषि ? हन्त !
वर्धते ते संरम्भः । स्थानं खलु ऋषिजनेन सर्वदमन इति
कृतनामधेयोऽसि ।
राजा- किं नु खलु बालेऽस्मिनौरस इव पुत्रे स्निह्मति मे मनः ?
नूनमनपत्यता मां वत्सलयति !
द्वितीया- एषा खलु केसरिणी त्वां लङ्घयति, यद्यस्याः पुत्रकं न मञ्चसि ।
बालः- (सस्मितम्) अहो बलीयः खलु भीतोऽस्मि ! (अधरं दर्शयति)
राजा- महतस्तेजसो बीजं बालोऽयं प्रतिभाति मे ।
स्पुलिङ्गावस्थया वह्निरेधापेक्ष इव स्थितः ॥१५॥
प्रथमा - वत्स, एनं बालमृगेन्द्रं मुञ्च । अपरं ते क्रीडनकं दास्यामि ।
बालः- कुत्र ? देह्येतत् ।
राजा- कथं चक्रवर्तिलक्षणमप्यनेन धार्यत ? तथा ह्यस्य –
प्रलोभ्यवस्तुप्रणयप्रसारितो विभाति जालग्रथिताङ्गुलिः करः ।
अलक्ष्यपत्रान्तरमिध्दरागया नवोषसा भिन्नमिवैकपङ्कजम् ॥१६॥
द्वितीया- सुव्रते, न शक्य एष वाचामात्रेण विरमयितुम् । गच्छ त्वम् ।
मदीय उटजे मार्कण्डेयस्यर्षिकुमारस्य वर्णचित्रितो मृत्तिका-
मयूरोऽस्ति । तमस्योपहर ।
प्रथमा- तथा । (इति निष्क्रान्ता)
बालः- अनेनैव तावत् क्रीडिष्यामि । (इति तापसीं विलोक्य हसति)
राजा- स्पृहयामि खलु दुर्ललितायास्मै ! (निः श्वस्य)
आलक्ष्यदन्तमुकुलाननिमित्तहासै-
रव्यक्तवर्णरमणीय वचः प्रवृत्तीन् ।
अङ्काश्रयप्रणयिनस्तनयान्वहन्तो
धन्यास्तदङ्गरजसा मलिनीभवन्ति ॥१७॥
तापसी- भवतु । मामयं गणयति । (पार्श्वमवलोक्य) कोऽत्र
ऋषिकुमाराणाम् ? (राजानमवलोक्य) भद्रमुख, एहि तावत् ।
मोचय अनेन दुर्मोकहस्तग्रहेण डिम्बलीलया बाध्यमानं
बालमृगेन्द्रम् ।
राजा- (उपगम्य, सस्मितम्) अयि भो महर्षिपुत्र !
एवमाश्रमविरुध्दवृत्तिना संयमः किमिति जन्मतस्त्वया ।
सत्वसंश्रयसुखोऽपि दूष्यते कृष्णसर्पशिशुनेव चन्दनः ॥१८॥
तापसी- भद्रमुख, न खल्वयमृषिकुमारः ।
राजा- आकारसदृशं चेष्टितमेवास्य कथयति । स्थानप्रत्ययात्तुवयमेवं
तर्किणः (यथाभ्यर्थितमनुतिष्ठन् बालस्पर्शमुपलभ्य, आत्मगतम्)
अनेन कस्यापि कुलङ्कुरेण स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम् ।
को निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्याद्यस्यायमङ्कात्कृतिनः प्ररुढः ॥१९॥
तापसी- (उभौ निर्वर्ण्य) आश्चर्यमाश्चर्यम् ।
राजा- आर्ये, किमिव ?
तापसी- “अस्य बालकस्य तेऽपि संवादिन्याकृतिरिति विस्मिता अस्मि ।
अपरिचितस्यापि तेऽप्रतिलोभः संवृत्तः” इति ।
राजा- (बालकमुपलालयन्) न चेन्मुनिकुमारोऽयमथ कोऽस्य
व्यपदेशः ?
तापसी- पुरुवंशः ।
राजा- (आत्मगतम्) कथमेकान्वयो मम ? अतः खलु मदनुकारिण-
मेनमत्रभवती मन्यते । अस्त्यैतत् पौरवाणामन्त्यं कुलव्रतम् ।
भवनेषु रसाधिकेषु पूर्वं
क्षितिरक्षार्थमुशन्ति ये निवासम् ।
नियतैकयतिव्रतानि पश्चात्
तरुमूलानि गृहीभवन्ति तेषाम् ॥२०॥
(प्रकाशम्) न पुनरात्मगत्या मानुषाणामेष विषयः !
तापसी- यथा भद्रमुखो भणति ।अप्सरसंबन्धेनास्य जनन्यत्र देवगुरोस्तपोवने
प्रसूता ।
राजा- (आत्मगतम्) हन्त ! द्वितीयमिदमाशाजननम् । (प्रकाशम् ) अथ
सा तत्प्रभवती किमारव्यस्य राजर्षेः पत्नी ?
तापसी- कस्तस्य धर्मदारपरित्यागिनो नाम सङ्कीर्तयितुं चिन्तयिष्यति ?
राजा- (स्वगतम्) इयंखलु कथा मामेव लक्ष्यीकरोति । यदि तावदस्य
शिशोर्मातरं नामतः पृच्छामि अथवा अनार्य परदारव्यवहारः ।
(प्रविश्य मृन्मयूरहस्ता)
तापसी - सर्वदमन, शकुन्तलावण्यं प्रेक्षस्व ।
बालः- (सदृष्टिक्षेपम्) कुत्र वा मम माता?
उभे- नामसादृश्येन विञ्चितो मातृवत्सलः ।
द्वितीया- वत्स अस्य मृत्तिकामयूरस्य रम्यत्वं पश्येति भणितोऽसि ।
राजा- (आत्मगतम्) किं वा शकुन्तलेत्यस्य मातुराख्या ? सन्ति
पुनर्नामधेयसादृश्यानि ।अपि नाम मृगतृष्णिकेव नाममात्र प्रस्तावो
मे विषादाय कल्पते !
बालः - मातः, रोचते म एष भद्रमयूरः (इति क्रीडनकमादत्ते)
प्रथमा- (विलोक्य सोद्वेगम्) अहो । रक्षाकरण्डकमस्य मणिबन्धे न
दृश्यते ।
राजा- अलमावेगेन – नन्विदमस्य सिंहशावविमर्दात्परिभ्रष्टम् ।
(इत्यादातुमिच्छति )
उभे- मा खल्वेतदवलम्ब्य--- कथं गृहीतमनेन !
(इति विस्मयादुरोनिहितहस्ते परस्परमवलोकयतः)
राजा- किमर्थं प्रतिषिध्दाः स्मः ?
प्रथमा - श्रृणोतु महाराजः । एषाऽपराजिता नामौषधिरस्य जातकर्मसमये
भगवता मारीचेन दत्ता । एनां किल मातापितरावात्मानं च
वर्जयित्वाऽपरो भूमिपतितां न गृह्णाति ।
राजा- अथ गृह्णाति ?
प्रथमा- ततस्तं सर्पो भूत्वा दशति ।
राजा- भवतीभ्यां कदाचिदस्याः प्रत्यक्षीकृता विक्रिया ?
उभे- अनेकशः ।
राजा - सहर्षम् , (आत्मगतम्) कथमिव सम्पूर्णमपि मे मनोरथं
नाभिनन्दामि ! (इति बालं परिष्वजते)
द्वितीया- सुव्रते, एहि । इमं वृत्तान्तं नियमव्यापृतायै शकुन्तलायै
निवेदयावः । (इति निष्क्रान्ते)
बालः- मुञ्च माम् । यावन्मातुः सकाशं गमिष्यामि ।
राजा- पुत्रक, मया सहेव मातरमभिनन्दिष्यसि ।
बालः - मम खलु तातो दुष्यन्तः ! न त्वम् ।
राजा -(सस्मितम्) एष विवाद एव प्रत्याययति !
(ततः प्रविशत्येकवेणीधरा शकुन्तला)
शकुन्तला – विकारकालेऽपि प्रकृतिस्थां सर्वदमनस्यौषधिं श्रुत्वा न म
आशासीदात्मनो भागधेयेषु । अथवा, यथा सानुमत्याख्यातं तथा
सम्भाव्यत एतत् ।
राजा -(शकुन्तलां विलोक्य) अये, सेयमत्रभवती शकुन्तला । यैषा –
वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः ।
अतिनिष्करुणस्य शुध्दशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ॥२१॥
शाकुन्तला – (पाश्चात्तापविवर्णं राजानं दृष्ट्वा) न खल्वार्यपुत्र इव । ततः
क एष इदानीं कृतरक्षामङ्कलं दारकं मे गात्रसंसर्गेण दूषयति ?
बालः- (मातरमुपेत्य) मातः एष कोऽपि पुरुषो मां पुत्र इति आलिङ्गति ।
राजा- प्रिये, क्रौर्यमपि मे त्वयि प्रयुक्तमनुकूलपरिणामं संवृत्तं,
यदहमिदानीं त्वया प्रत्यभिज्ञातमात्मानं पश्यामि ।
शकुन्तला -(आत्मगतम्) हृदय, समाश्वसिहि । समाश्वसिहि ।
परित्यक्तमत्सरेणानुकम्पितास्मि दैवेन । आर्यपुत्रः खल्वेषः
राजा - प्रिये, -
स्मृतिभिन्नमोहतमसो दिष्टया –
प्रमुखे स्थितासि मे सुमुखी ।
उपरागान्ते शशिनः समुपगता-
रोहिणी योगम् ॥२२॥
शकुन्तला – जयतु जयत्वार्य - - - (इत्यर्धोक्ते बाष्पकण्ठी विरमति )
राजा- सुन्दरि !
बाष्पेण प्रतिषिध्देऽपि जवशब्दे जितं मया ।
यत्ते दृष्टमसंस्कारपाटलोष्ठपुटं मुखम् ॥२३॥
बालः - मातः कः एषः ?
शकुन्तला- वत्स, ते भागधेयानि पृच्छ ।
 राजा- (शकुन्तलायाः पादयोः प्रणिपत्य)
सुतनु हृदयात्प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते
किमपि मनसः सम्मोहो मे तदा बलवानभूत् ।
प्रबलतमसामेवंप्रायाः शुभेषु हि वृत्तयः
स्रजमपि शिरस्यन्धः क्षिप्तां धुनोत्यहिशङ्कया ॥२४॥
शकुन्तला – उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः । नूनं मे सुचरितरतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु
परिणामाभिमुखमासीद्येन सानुक्रोशोऽप्यार्यपुत्रो मयि तथाविधः
संवृत्तः । (राजोत्तिष्ठति)
शकुन्तला – अथ कथमार्यपुत्रेण स्मृतो दुःखभाग्याय जनः ?
राजा - उद्घृतविषादशल्यः कथयिष्यामि ।
मोहान्मया सुतनु पूर्वमुपेक्षितस्ते
यो बध्दबिन्दुरधरं परिबाधमानः ।
ते तावदाकुटिलपक्ष्मविलग्नमद्य
बाष्पं प्रमृज्य विगतानुशयो भवेयम् ॥२५॥
(राजा यथोक्तमनुतिष्ठति)
शकुन्तला – (नाममुद्रां दृष्ट्वा) आर्यपुत्र, इदं तदङ्गुलीयकम् ।
राजा - अस्मादङ्गुलीयोपलम्भात् खलु स्मृतिरुपलब्धा !
शकुन्तला – विषमं कृतमनेन यत्तदार्यपुत्रस्य प्रत्ययकाले दुर्लभम् आसीत् ।
राजा- तेन हि ऋतुसमवायचिह्नं प्रतिपद्यतां लताकुसुमम् ।
शकुन्तला – नास्य विश्वसिमि । आर्यपुत्र एवैतध्दारयतु ।
(ततः प्रविशति मातलि )
मातलिः- दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन च आयुष्मान् वर्धते ।
राजा- अभूत्स्सम्पादितस्वादुफलो मे मनोरथः । मातले, न खलु
विदितोऽयमाखण्डलेन वृत्तान्तः स्यात् ?
मातलिः- (सस्मितम्) किमीश्वराणां परोक्षम् ? एत्वायुष्मान् । भगवान्
मारीचस्ते दर्शनं वितरति ।
राजा- शकुन्तले, अवलम्ब्यतां पुत्रः । त्वां पुरस्कृत्य भगवन्तं
द्र्ष्टुमिच्छामि ।
शकुन्तला – जिह्नेम्यार्यपुत्रेण सह गुरुसमीपं गन्तुम् ।
राजा- अप्याचरितव्यमभ्युदयकालेषु । एह्येहि ।
(ततः प्रविशत्यदित्या सार्धमासनस्थो मारीचः)
मारीचः- (राजानमवलोक्य) दाक्षायणि !
पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी
दुष्यन्त इत्यभिहितो भुवनस्य भर्ता ।
चापेन यस्य विनिवर्तितकर्म जातं
तत्कोटिमत्कुलिशमाभरणं मघोनः ॥२६॥
अदितिः- संभावनीयानुभावस्याकृतिः !
मातलिः- आयुष्मन्, एतौ पुत्रपीतिपिशुनेन चक्षुषा दिवौकसां
पितरावायुष्मन्तमवलोकयत । तावुपसर्प ।
राजा- मातले !
प्राहुर्द्वादशधा स्थितस्य मुनयो यत्तेजसः कारणं
भर्तारं भुवनत्रयस्य सुषवे यद्यज्ञभागेश्वरम् ।
यस्मिन्नात्मभवः परोऽपि पुरुषश्चक्रे भवायास्पदं
द्वन्द्वं दक्षमरीचि संभवमिदं तत्स्रष्टुरेकान्तरम् ॥२७॥
मातलिः – अथ किम् ?
राजा- (उपगम्य) उभाभ्यामपि वासवनियोज्यो दुष्यन्तः प्रणमति ।
मारीचः – वत्स, चिरं जीव ! पृथ्वीं पालय ।
अदिति - वत्स, अप्रतिरथो भव !
मारीचः- वत्से,
आखण्डलभसो भर्ता जयन्तप्रतिमः सुतः ।
आशीरन्त्या न ते योग्या पौलोमी सदृशी भव ॥२८॥
अदितिः- जाते, भर्तुर्बहुमता भव । अयं च दीर्घायुर्वत्सक उभयकुलनन्दनो
भवतु । उपविशत ।
(सर्वे प्रजापतिमभितः उपविशन्ति)
मारीचः – (एकैकं निर्दिशन् )
दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी सदपत्यमिदं भवान् ।
श्रध्दा वित्तं विधिश्चेति त्रितयं तत्समागतम् ॥२९॥
राजा- भगवन् प्रागभिप्रेतसिध्दिः, पश्चाद्दर्शनम् ! अतोऽपूर्वः खलु
वोऽनुग्रहः कुतः,-
उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं धनोदयः प्राक्तदनन्तरं पयः ।
निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः ॥३०॥
मातलिः- एवं विधातारः प्रसीदन्ति ।
राजा- भगवन् इमामाज्ञाकरीं वो गान्धर्वेण विवाहविधिना उपयम्य
कस्यचित्कालस्य बन्धुभिरानीतां स्मृतिशैथिल्यात्प्रत्यादिशन्न-
पराध्दोऽस्मि तत्रभवतो युष्मत्सगोत्रस्य कण्वस्य । पश्चादङ्गुली-
यकदर्शनात् ऊढपूर्वां तद् दुहितरमवगतोऽहम् । तच्चित्रमिव मे
प्रतिभाति ।
यथा गजो नेति समक्षरुपे
तस्मिन्नपक्रामति संशयः स्यात् ।
पदानि दृष्ट्वा तु भवेत्प्रतीति –
स्तयाविधो मे मनसां विकारः ॥३१॥
मारीचः- वत्स, अलमात्मापराधशङ्कया । संमोहोऽपि त्वयि नानुपपन्नः ।
श्रूयताम् ।
राजा- अवहितोऽस्मि ।
मारीचः – यदैवाप्सरतीर्थावतरणात् प्रत्याख्यानवैक्लव्यां शकुन्तलामादाय
मेनका दाक्षायणीमुपगता तदेव ध्यानादवगतोऽस्मि दुर्वाससः
शापादियं तपस्विनी सहधर्मचारिणी त्वया प्रत्यादिष्टा, नान्यथेति ।
स चायमङ्गुलीयकदर्शनावसानः !
राजा- ( सोच्छवासम्) एष वचनीयान्मुक्तोऽस्मि !
शकुन्तला –(स्वगतम्) दिष्ट्याऽकारणप्रत्यादेशी नार्यपुत्रः । न पुन शप्तमात्मानं
स्मरामि । अथवा प्राप्तो मया स हि शापो विरहशून्यहृदयया न
विदितः । अतः सखीभ्यां सन्दिष्टाऽस्मि भर्तुरङ्गुलीयकं
दर्शयितव्यमिति ।
मारीचः- वत्से विदितार्थासि । तदिदानीं सहधर्मचारिणं प्रति न त्वया मन्युः
कार्यः । पश्य ।
शापादसि प्रतिहता स्मृतिरोधरुक्षे
भर्तर्यतेततमसि प्रभुता तवैव ।
छाया न मूर्छति मलोपहृतप्रसादे
शुध्दे तु दर्पणतले सुलभावकाशा ॥३२॥
राजा- यथाह भगवान् ।
मारीचः- वत्स , किञ्चिदभिनन्दितस्त्वया विधिवदस्माभिः अनुष्ठितजातकर्मा
पुत्र एष शाकुन्तलेयः ?
राजा- भगवन्, अत्र खलु मे वंशप्रतिष्ठा !
(इति बालं हस्तेन गृह्णाति)
मारीचः – तथा भाविनमेनं चक्रवर्तिनमवगच्छतु भवान् । पश्य,-
रथेनानुध्दातस्तिमितगतिना तीर्णजलधिः
पुरा सप्तद्वीपां जयति वसुधामप्रतिरधः ।
इहायं सत्वानां प्रसभदमनात्सर्वदमनः
पुनर्यास्यत्याख्यां भरत इति लोकस्य भरणात् ॥३३॥
राजा- भगवता कृतसंस्कारे सर्वमस्मिन् वयमाशास्महे !
अदितिः- भगवन्, अस्याः दुहितृमनोरथसम्पत्तेः कण्वोऽपि तावत्
श्रुतविस्तारः क्रियताम् । दुहितृवत्सला मेनकेहैवोपचरन्ती तिष्ठति ।
शकुन्तला- (आत्मगतम्) मनोरथ खलु मे भणितो भगवत्या तपः प्रभावात्
प्रत्यक्षं सर्वमेव तत्र भवतः ।
राजा- अतः खलु मम नातिक्रुध्दो मुनिः ।
मारीचः- तथाप्यसौ प्रियमस्माभिः श्रावयितव्य । कः कोऽत्र भोः ?
(प्रविश्य) शिष्यः – भगवन् अयमस्मि ।
मारीचः- गालव, इदानीमेव विहायसा गत्वा मम वचनात् तत्रभवते कण्वाय
प्रियमावेदय यथा- “पुत्रवती शकुन्तला । तच्छापनिवृत्तौ स्मृतिमत
दुष्यन्तेन प्रतिगृहीता” इति ।
शिष्यः- यदाज्ञापयति भगवान् । (इति निष्क्रान्तः)
मारीचः- वत्स, त्वमपि स्वापत्यदारसहितः सख्युराखण्डलस्य रथमारुह्य
ते राजधानीं प्रतिष्ठस्व ।
राजा- यदाज्ञापयति भगवन् ।
मारीचः- अपि च ।-
तव भवतु बिडौजा प्राज्यवृष्टि प्रजासु
त्वमपि विततयज्ञः स्वर्गिणः प्रीणयस्व ।
युगशतपरिवर्तानेवमन्योन्यकृत्यै-
र्नयतमुभयलोकानुग्रहश्लाघनीयैः ॥३४॥
राजा- भगवन, य्थाशक्ति श्रेयसे यतिष्ये ।
मारीचः- वत्स, किं ते भूयः प्रियमुपहरामि ?
राजा- अतः परमपि प्रियमस्ति ? यदिह भगवान् प्रियं कर्तुमिच्छति
तर्हीदिमस्तु ।
(भरतवाक्यम्)
प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः
सरस्वती श्रुतमहतां महीयताम्
ममापि च क्षपयतु नीललोहितः
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ॥३५॥
(इति निष्क्रान्ताः सर्वे)
-इति सप्तमोऽङ्कः-

अभिज्ञानशाकुन्तलम् - षष्ठोऽङ्कः

 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
षष्ठोऽङ्कः
कालिदासः
सप्तमोऽङ्कः →


(ततः प्रविशति नागरिकः श्यालः, पश्चाद्बध्दं पुरुषमादायरक्षिणैच )
रक्षिणौ-(पुरुषं ताडयित्वा)अरे कुम्भीरक, कथय कुत्र त्वया
एतन्मणिबन्धनोत्कीर्णनामधेयं राजकीयमङ्गुलीयकं समासादितम् ।
पुरुषः- (भीतिनाटितकेन) प्रसीदन्तु भावमिश्राः । नाहमीदृशकर्मकारी ।
प्रथमः- किं शोभनो ब्राह्मण इति कृत्वा राज्ञा प्रतिग्रहो दत्तः ?
पुरुषः- श्रृणुतेदानीम् । अहं शक्रावताराभ्यन्तरवासी धीवरः ।
द्वितीयः - पाटच्चर, किमस्माभिर्जातिः पृष्टा ?
श्यालः- सूचक, कथयतु सर्वमनुक्रमेण । मौनमन्तरा प्रतिबध्नीतम् ।
उभौ- यदावुत्त आज्ञापयति कथय ।
पुरुषः- अहं जालोङ्गालादिभिर्मत्स्यबन्धनोपायैः कुटुम्बभरणं करोमि ।
श्यालः- (विहस्य) विशुध्द इदानीमाजीवः ।
पुरुषः- भर्तः, मा एवं भण ।
सहजं किल यद्विनिन्दितं न खलु तत्कर्म विवर्जनीयम् ।
पशुमारणकर्मदारुणोऽनुकम्पामृदुरेव श्रोत्रियः ॥१॥
श्यालः- ततस्ततः ?
पुरुषः- एकस्मिन्दिवसे खण्डशो रोहितमत्स्यो मया कल्पितः ।
यावत्तस्योदराभ्यन्तरे प्रेक्षे तावदिदं रत्नभासुरमङ्गुलीयकं दृष्टम् ।
पश्चात् अहमस्य विक्रयाय दर्शयन् गृहीतो भावमिश्रैः । मारयत
वा मुञ्चत वा । अयमस्यागमवृत्तान्तः ।
श्यालः- जानुक, विस्रगन्धी गोधादी मत्स्यबन्ध एव निः संशयम् ।
अङ्गुलीयकदर्शनमस्य विमर्शयितव्यम् । राजकुलमेव गच्छामः ।
रक्षिणौ- तथा । गच्छ, अरे ग्रन्थिभेदक ।
श्यालः- सूचक, इमं गोपुरद्वारेऽप्रमत्तौ प्रतिपालयतं यावदिदम् अङ्गुलीयकं
यथागमनं भर्ते निवेद्य ततः शासनं प्रतीक्ष्य निष्र्कामामि ।
उभौ- प्रविशत्वावुत्तः स्वामिप्रसादाय ।(निष्क्रान्तः श्यालः)
प्रथमः- जानुक, विरायते खल्वावुत्तः ।
द्वितीयः- नन्ववसरोपसर्पणीया राजानः !
प्रथमः- जानुक, स्फुरतो मम हस्तावस्य वधस्य सुमनसः पिनध्दुम् ।
(इति पुरुषं निर्दिशति)
पुरुषः- नार्हति भावोऽकारणमारणो भवितुम् ।
द्वितीयः- (विलोक्य) एष नौ स्वामी पत्रहस्तो राजशासनं प्रतिष्येतोमुखो
दृश्यते । गृध्र बलिर्भविष्यसि शुनो मुखं वा द्रक्ष्यसि ।
(प्रविश्य) श्यालः- सूचक, मुच्यतामेव जलोपजीवी । उपपन्नः खल्वस्याङ्गुली-
यस्यागमः ।
सूचकः- यथावुत्तो भणति । एष यमसदनं प्रविश्य प्रतिनिवृत्तः ! (इति
पुरुषं परिमुक्तबन्धनं करोति )
पुरुषः- (श्यालं प्रणम्य) भर्तः, त्वदीयं मे जीवितम् ।
श्यालः- एष भर्ताङ्गुलीयकमूल्यसंमितः प्रसादोऽपि दापितः ( इति पुरुषाय
स्वं प्रयच्छति )
पुरुषः- (सप्रणामं प्रतिगृह्य भर्तः अनुगृहितोऽस्मि ।
सूचकः- एषः नामानुग्रह । यच्छूलादवतार्य हस्तिस्कन्धे प्रतिष्ठापितः ।
जानुकः- आवुत्त पारितोषिकं कथयति तेनाङ्गुलीयकेन भर्तुः सम्मतेन
भवितव्यमिति ।
श्यालः- न तस्मिन्महार्हं रत्नं भर्तुर्बहुमतमिति तर्कयामि । तस्य दर्शनेन
भर्त्राऽभिमतो जनः स्मृतः । मुहूर्तं प्रकृतिगम्भीरोऽपि पर्यश्रुनयन
आसीत् ।
सूचकः- सेवितं नामावुत्तेन !
जानुकः- ननु भण । अस्य कृते मात्स्यिकमर्तुरिति ।
(इति पुरुषमसूयया पश्यति)
पुरुषः- भट्टारक, इतोऽर्धं युष्माकं सुमनोमूल्यं भवतु ।
जानुकः- एतावद्युज्यते ।
श्यालः- धीवर, महत्तरस्त्वं प्रियवयस्यक इदानीं मे संवृत्तः । कादम्बरी-
साक्षिकमस्माकं प्रथमसोहृदम् इष्यते । तच्छौण्डिकापणमेव
गच्छामः । (इति निष्क्रान्तास्सर्वे)
प्रवेशकः
(ततः प्रविशत्याकाशयानेन सानुमती नामाप्सराः)
सानुमती- निर्वर्तितं मया पर्यायनिर्वर्तनीयमप्सरस्तीर्थसान्निध्यं यावत्साधुजन-
स्याभिषेककाल इति साम्प्रतमस्य राजर्षेरुदन्तं प्रक्षीकरिष्यामि ।
मेनकासम्बन्धेन शरीरभूता मे शकुन्तला । तया च दुहितृनिमित्त-
मादिष्टपूर्वास्मि । (समन्तादवलोक्य) किं नु खलु ऋतूत्सवे
अपि निरुत्सवारम्भमिव राजकुलं दृश्यते । अस्ति मे विभवः
प्रणिधानेन सर्वं परिज्ञातुम् । किं तु सख्या आदरो मया
मानयितव्यः । भवतु । अनयोरेवोद्यानपालिकयोस्तिरस्करिणी-
प्रतिच्छन्ना पार्श्ववर्तिनी भूत्वोपलप्स्ये । (इति नाट्येनावतीर्य स्थिता)
(ततः प्रविशति चूताङ्गुरमवलोकयन्ती चेटी, अपरा च प्रुष्ठतस्तस्याः)
प्रथमा-
आताम्रहरितपाण्डुर जीवितसर्वं वसन्तमासस्य ।
दष्टोऽसि चूतकोरक ऋतुमङ्गल त्वां प्रसादयामि ॥२॥
द्वितीय- परभृतिके, किमेकाकिनी मन्त्रयसे ?
प्रथमा- मधुकरिके, चूतकलिकां दृष्ट्वोन्मत्ता परभृतिका भवति ।
द्वितीया- (सहर्षं त्वरयोपगम्य) कथमुपस्थितो मधुमासः !
प्रथमा- मधुकरिके, तवेदानीं काल एष मदविभ्रमगीतानाम् ।
द्वितीया- सखिं, अवलम्बस्य मां यावदग्रपादस्थिता भूत्वा चूतकलिकां
गृहीत्वा कामदेवार्चनं करोमि ।
प्रथमा- यदि ममापि खल्वर्धमर्चनफलस्य ।
द्वितीया- अकथितोऽप्येतत् संपद्यते यत एकमेव नौ जीवितं ध्दिधा स्थितं
शरीरम् । (सखीमवलम्ब्य स्थिता चूताङ्कुरं गृहणाति । अये,
अप्रतिबुध्दोऽपि चूतप्रसवोऽत्र बन्धभङ्गसुरभिर्भवति ! (इति
कपोतहस्तकं कृत्वा)
त्वमसि मया चूताङ्कुर दत्त कामाय गृहीतधनुषे
पथिकजनयुवतिलक्ष्यः पञ्चाभ्यधिक शरो भव ॥३॥
(इति चूताङ्कुरं क्षिपति । ततः प्रविशत्यपटीक्षेपेण कुपितः क::ञ्चुकिः)
कञ्चुकी – मा तावदनात्मज्ञे । देवेन प्रतिषिध्दे वसंतोत्सवे त्वमाम्रकलिकाभङ्गं
किमारभसे ?
उभे- (भीते) प्रसीदत्वार्यः । अगृहीतार्थे आवाम् ।
कञ्चुकी – न किल श्रुतं युवाभ्यां यद्वासन्तिकैस्तरुभिरपि देवस्य शासनं
प्रमाणीकृतं तदाश्रयिभिः पत्रिभिश्च । तथा हि, -
चूतानां चिरनिर्गतापि कलिका बध्नाति न स्वं रजः
सन्नध्दं यदपि स्थितं कुरबकं तत्कोरकावस्थया ।
कण्ठेषु स्खलितं गतेऽपि शिशिरे पुंस्कोकिलानांरुतं
शङ्के संहरति स्मरोऽपि चकितस्तूणार्धकृष्टंशरम् ॥४॥
सानुमती- नास्ति सन्देहः । महाप्रभावो राजर्षिः !
प्रथमा- आर्य, कति दिवसन्यावयोमित्रावसुना राष्ट्रियेण भर्तुः पादमूलात्
प्रेषितयोः । इत्थं च नौ प्रमदवनस्य पालनकर्म समर्पितम् ।
तदागन्तुकतयाऽश्रुतपूर्व आवाभ्यामेव वृत्तान्तः ।
कञ्चुकी – भवतु । न पुनरेवं प्रवर्तितव्यम् ।
उभे- आर्य, कौतूहलं नौ । यद्यनेन जनेन श्रोतव्यं, कथयत्वार्यः
किन्निमित्तं भर्ता वसन्तोत्सवः प्रतिषिध्दः ।
सानुमती – उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः ! गुरुणा कारणेन भवितव्यम् ।
कञ्चुकी – (स्वगतम्) बहुलीभूतमतत्किं न कथ्यते ?
(प्रकाशं) किमत्रभवत्योः कर्णपथं नायातं शकुन्तला प्रत्यादेशकौलीनम् ?
उभे - श्रुतं राष्ट्रियमुखाद्यावदङ्गुलीयकदर्शनम् ।
कञ्चुकी- तेन ह्यल्पं कथयितव्यम् । यदैव खलु स्वाङ्गुलीयकदर्शनादनुस्मृतं
देवेन “सत्यमूढपर्वा मे तत्र भवती रहसि शकुन्तला मोहात्
प्रत्यादिष्टा” इति, तदाप्रभृत्येव पश्चात्तापमुपगतो देवः । तथा
हि-
रम्यं द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिर्न प्रत्यहं सेव्यते
शय्याप्रान्तविवर्तनैर्विगमयत्युन्निद्र एव क्षपाः
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्तः पुरेभ्यो यदा
गोत्रेषु स्खलितास्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम् ॥५॥
सानुमती- प्रियं मे
कञ्चुकी- अस्मात् प्रभवतो वैमनस्यादुत्सवः प्रत्याख्यातः ।
उभे- युज्यते ।
(नेपथ्ये) एतु एतु भवान् ।
कञ्चुकी- (कर्णं दत्वा) अये, इत एवाभिवर्तते देवः । स्वकर्मानुष्ठीयताम् ।
उभे- तथा (इति निष्क्रान्ते)
 ::::(ततः प्रविशति पश्चात्तापसदृशवेषो राजा, विदूषकः, प्रतिहारी च )
कञ्चुकी- (राजानमवलोक्य) अहो सर्वास्ववस्थासु रमणीयत्वम्
आकृतिविशेषाणाम् ! एवमुत्सुकोऽपि प्रियदर्शनो देवः । तथा
हि, -
प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधिर्वामप्रकोष्ठार्पितं
बिभ्रत्काञ्चनमेकमेव वलयं श्वासोपरक्ताधरः ।
चिन्ताजागरण प्रतान्तनयनस्तेजोगुणादात्मनः
संस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालक्ष्यते ॥६॥
सानुमती- (राजानं दृष्ट्वा) स्थाने खलु प्रत्यादेशविमानितापि अस्य कृते
शकुन्तला क्लाम्यति ।
राजा- (ध्यानमन्दं परिक्रम्य)
प्रथमं सारङ्गाक्ष्या प्रियया प्रतिबोध्यमानमपि सुप्तम् ।
अनुशयदुःखायेदं हृतहृदयं संप्रति विबुध्दम् ॥७॥
सानुमती- ननु ईदृशानि तपस्विन्या भागधेयानि !
विदूषकः- (स्वगतम्) लङ्घित एष भूयोऽपि शकुन्तलाव्याधिना । न जाने
कथं चिकित्सितव्यो भविष्यतीति !
कञ्चुकी- (उपगम्य) जयतु जयतु देवः । महाराज, प्रत्यवेक्षिताः
प्रमदवनभूमयः । यथाकाममध्यास्तां विनोदस्थानानि महाराजः ।
राजा- वेत्रवति, मद्वचनादमात्यमार्यपिशुनं ब्रूहि, -चिरप्रबोधान्न
संभावितमस्माभिरद्य धर्मासनमध्यासितुम् । यत्प्रत्यवेक्षितं
पौरकार्यमार्येण तत्पत्रमारोप्य दीयतां इति ।
प्रतीहारी- यद्देव आज्ञापयति । (निष्क्रान्ताः)
राजा- वातायन, त्वमपि स्वं नियोगमशून्यं कुरु ।
कञ्चुकी – यदाज्ञापयति देवः । (इति निष्क्रान्तः)
विदूषकः – कृतं भवता निर्मक्षिकम् । साम्प्रतं शिशिरातपच्छेद-
रमणीयेऽस्मिन्प्रमदवनोद्देश आत्मानं रमयिष्यसि ।
राजा- वयस्य यदुच्यते रन्ध्रोपनिपातिनोऽनर्था इति तदव्यभिचारि वचः ।
कुतः –
मुनिसुता प्रणयस्मृतिरोधिना मम च मुक्तमिदं तमसा मनः ।
मनसिजेन सखे प्रहरिष्यता धनुषि चूतशरश्च निवेशितः ॥८॥
विदूषकः- तिष्ठ तावत् । अनेन दण्डकाष्ठेन कन्दर्पबाणं नाशयिष्यामि ।
(इति दण्डकाष्ठमुद्यम्य चूताङ्कुरं पातयितुमिच्छति )
राजा- (सस्मितम्) भवतु । दृष्टं बह्मवर्चसम् । सखे, कोपविष्टः प्रियायाः
किञ्चिदनुकारिणीषु लतासु दृष्टिं विलोभयामि ?
विदूषकः- नन्वासन्नपरिचारिका चतुरिका भवता सन्दिष्टा –
“माधवीमण्डप इमां वैलामतिवाहयिष्ये । तत्र मे चित्रफलकगतं
स्वहस्तलिखिता तत्रभवत्याः शकुन्तलायाः प्रतिकृतिमानय” इति ।
राजा- ईदृशं हृदयविनोदनस्थानम् ! तत्वमेव मार्गमादेशय ।
विदूषकः – इत इतो भवान् ।
 ::(उभौ परिक्रामतः । सानुमत्यनुगच्छति ।)
विदूषकः- एष मणिशिलापट्टकसनाथो माधवीमण्डप उपहाररमणीयतया
निःसंशयं स्वागतेनैव नौ प्रतीच्छति । तत्प्रविश्य निषीदतु भवान् ।
(उभौ प्रवेश कृत्वोपविष्टौ )
सानुमती- लतासंश्रिता द्रक्ष्यामि तावत्सख्याः प्रतिकृतिम् । ततस्तस्यै
भर्तुर्बहुमुखमनुरागं निवेदयिष्यामि ।
(इति तथा कृत्वा स्थिता)
राजा- सखे, सर्वमिदानीं स्मरामि शकुन्तलायाः प्रथमवृत्तान्तम्
कथितवानस्मि भवते च । स भवान् प्रत्यादेशवेलायां मत्समीपगतो
नासीत् । पूर्वमपि न त्वया कदाचित् सङ्कीर्तितं तत्रभवत्या नाम ।
कञ्चित् अहमपि विस्मृतवानसि त्वम् ?
विदूषकः – न विस्मरामि । किं तु सर्वंकथयित्वावसाने पुनस्त्वया
“परिहासविजल्प एष न भूतार्थः “इत्याख्यातम् । मयापि
मृत्पिण्डबुध्दिना तथैव गृहीतम् । अथवा भवितव्यानि खलु
बलवती !
सानुमती- एवं न्विदम् ।
राजा- (ध्यात्वा) सखे, त्रायस्व, माम् ।
विदूषकः- भोः किमेतत् ? अनुपपन्नं खल्वीदृशं त्वयि । कदापि सत्पुरुषाः
शोकावास्तव्या न भवन्ति । ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरयः ।
राजा- वयस्य, निराकरण विक्लवायाः प्रियायाः समवस्थामनुस्मृत्य
बलवदशरणोऽस्मि । सा हि,
इतः प्रत्यादेशात्स्वजनमनुगन्तुं, व्यवसिता
स्थिता तिष्ठेत्युच्चेर्वदति गुरुशिष्ये गुरु समे ।
पुनर्दृष्टिं बाष्पप्रसरकलुषामर्पितवती
मयि क्रूरे यत्तत्सविषमिव शल्यं दहति माम् ॥९॥
सानुमति – अहो ईदृशो स्वकार्यपरता ! अस्य सन्तापेनाहं रमे ।
विदूषकः- अस्ति मे तर्कः केनापि तत्रभवत्याकाशचारिणा नीतेति ।
राजा- कः पतिदेवतामन्यः परामर्ष्टुमुत्सहेत ? मेनका किल सख्यास्ते
जन्मप्रतिष्ठेति श्रुतवानस्मि । तत्सहचारिणीभिः सखी ते हृतेति मे
हृदयमाशङ्कते ।
सानुमती – सम्मोहः खलु विस्मयनीयो न प्रतिबोधः ।
विदूषकः- यद्येवम्, अस्ति खलु समागमः कालेन तत्रभवत्या ।
राजा- कथमिव ?
विदूषकः- न खलु मातापितरौ भर्तुवियोगदुःखितां दुहितरं चिरं द्र्ष्टुं पारयतः ।
राजा- वयस्य, -
स्वप्नो नु मया नु मतिभ्रमो नु
क्लिष्टं नु तावत्फलमेव पुण्यम् ।
असन्निवृत्त्यै तदतीतमेते
मनोरथा नाम तटप्रपाताः ॥१०॥
विदूषकः- मैवम् । नत्वङ्गुलीयकमेव निदर्शनमवश्यंभाव्यचिन्तनीयः समागमौ
भवतीति ।
राजा- (अङ्गुलीयकं विलोक्य) अये, इदं तावदसुलभस्थाभ्रंशि
शोचनीयम् !
तव सुचरितमङ्गुलीय नूनं प्रतनु ममेव विभाव्यते फलेना ।
अरुण नखमनोहरासु तस्याश्च्युतमसि लब्दपदं यदङ्गुलीषु ॥
सानुमती- यद्यन्यहस्तगतं भवेत्सत्यमेव शोचनीयं भवेत् ।
विदूषकः – भोः, इयं नाममुद्रा केनोध्दातेन तत्रभवत्या हस्ताभ्यासं प्रापिता ?
सानुमती – ममापि कौतूहलेनाकारिता एषः ।
राजा- श्रूयतां । तपोवनात्स्वनगराय प्रस्थितं मां प्रिया सबाष्पमाह –
“कियच्चिरेणार्यपुत्रः प्रतिपत्तिं दास्यति?” इति ।
विदूषकः- ततस्ततः
राजा- पश्चादिमां मुद्रां तदङ्गुलौ निवेशयता मया प्रत्यभिहिता ।
एकैकमत्र दिवसे दिवसे मदीयं
नामाक्षरं गणय गच्छसि यावदन्तम्।
तावत्प्रिये मदवरोधगृहप्रवेशं
नेता जनस्तव समीपमुपैष्यतीति ॥१२॥
तच्च दारुणात्मना मया मोहान्नानुष्ठितम् ।
सानुमती – रमणीयः खल्ववधिर्विधिना विसंवादितः ।
विदूषकः- अथ कथं धीवरकल्पितस्य रोहितमत्स्योदराभ्यन्तरे आसीत् ?
राजा- शचितीर्थं वन्दमानायाः सख्यास्ते हस्ताद्गङ्गास्त्रोतसि परिभ्रष्टम् ।
विदूषकः – युज्यते ।
सानुमती- अत एव तपस्विन्या शकुन्तलाया अधर्मभीरोरस्य राजर्षेः परिणये
सन्देहः आसीत् । अथवेदृशोऽनुरागोऽभिज्ञानमपेक्षते;-
कथमिवैतत् ?
राजा- उपलप्स्ये तावदिदमङ्गुलीयकम् ।
विदूषकः- (आत्मगतम्) गृहीतोऽनेन पन्था उन्मत्तानाम् ।
राजा-
कथ नु तं बन्धुरकोमलाङ्गुलिं
करं विहायासि निमग्नमम्भसि ?
अचेतनं नाम गुणं न लक्षयेत्
मयैव कस्मादवधीरिता प्रिया ॥१३॥
विदूषकः- (आत्मगतम्) कथं बुभुक्षया खादितव्योऽस्मि !
राजा- प्रिये, अकारणापरित्यागानुशयतप्तहृदयस्तावदनुकतामयं जनः
पुनर्दर्शनेन ।
(ततः प्रविशत्ययटीक्षेपेण चित्रफलकहस्ता चतुरिका)
चतुरिका- इयं चित्रगता भट्टिनी । (इति चित्रफलकं दर्शयति)
विदूषकः – (विलोक्य) साधु, वयस्य मधुरावस्थानदर्शनीयो भवानुप्रवेशः
स्खलतीव मे दृष्टिर्निम्नोन्नतप्रदेशेषु ।
सानुमती- अहो राजर्षिपुणता ! जाने सख्यग्रतो मे वर्तते इति ।
राजा- यद्यत्साधु न चित्रे स्यात्क्रियते तत्तदन्यथा ।
तथापि तस्या लावण्यं रेखया किञ्चिदन्वितम् ॥१४॥
सानुमती- सदृशमेतत्पश्चात्तापगुरोः स्नेहस्यानवलेपस्य च ।
विदूषकः – भोः इदानीं तिस्रस्तत्रभवत्यो दृश्यन्ते । सर्वाश्च दर्शनीयाः
कतमाऽत्र तत्र भवती शकुन्तला ?
सानुमती – अनभिज्ञः खल्वीदृशस्य रुपस्य मोघदृष्टिरयं जनः ।
राजा- त्वं तावत्कतमां तर्कयसि ?
विदूषकः – तर्कयामि यैषा शिथिलबन्धनोद्वान्त कुसुमेन केशान्ते-
नोद्भिन्नस्वेदबिन्दुना वदनेन विशेषतोऽपसृताभ्यां बाहुभ्यामव-
सेकस्निग्धतरुणपल्लवस्य चूतपादपस्य पार्श्व ईषत्परिश्रान्ते-
वालिखिता, सा शकुन्तलाः इतरे सरव्याविति ।
राजा- निपुणो भवान् । अस्त्यत्र मे भावचिन्हम् ।
खिन्नाङ्गुलिविनिवेशो रेखाप्रान्तेषु दृश्यते मलिनः ।
अश्रु च कपोलपतितं दृश्यमिदं वर्णिकोच्छ्वासात् ॥१५॥
चतुरिके, अर्धलिखितमेतद्विनोदस्थानम् । गच्छ । वर्तिकां तावदानय ।
चतुरिका- आर्य माधव्य अवलम्बस्व चित्रफलकं यावदागच्छामि ।
राजा- अहमेवैतदवलम्बे । (यथोक्तं करोति निष्क्रान्ता चैव)
राजा- (निःश्वस्य)
साक्षात्प्रियामुपगतामपहाय पूर्वं
चित्रार्पितामहमिमां बहुमन्यमानः ।
स्त्रोतोवहां पयि निकामजलामतीत्य
जातः सखे प्रणयवान्मृगतृष्णिकायाम् ॥१६॥
विदूषकः – (आत्मगतम्) एषोऽत्रभवान्नदीमतिक्रम्य मृगतृष्णिकां संक्रान्तः ।
(प्रकाशम्) भोः । अपरं किमत्र लिखितव्यम् ?
सानुमती – यो यः प्रदेशः सख्याः मेऽभिरुपस्तं तमालेखितुकामो भवेत् ।
राजा- श्रूयताम् ।
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्त्रोतोवहा मालिनी
पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरोः पावनाः ।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोनिर्मातुमिच्छाम्यधः
श्रृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम् ॥१७॥
विदूषकः – (आत्मगतम्) यथाहं पश्यामि पूरितव्यमनेन चित्रफलकं
लम्बकूर्चानां तापसानां कदम्बैः ।
राजा- वयस्य अन्यञ्च । शकुन्तलायाः प्रसाधनमभिप्रेतमत्र
विस्मृतमस्माभिः ।
विदूषकः – किमिव ?
सानुमती – वनवासस्य सौकुमार्यस्य विनयस्य च यत्सदृशं भविष्यति ।
राजा-
कृतं न कर्णार्पितबन्धनं सखे
शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम् ।
न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं
मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे ॥१८॥
विदूषकः – भोः किं नु तत्रभवति रक्तकुवलयपल्लवशेभिनाग्रहस्तेन
मुखमावार्य चकित चकितेव स्थिता ? (सावधानं निरुप्य,
दृष्ट्वा) आः । एष दास्याः पुत्रः कुसुमरसपाटञ्चरस्तत्रभवत्या
वदनकमलमभिलङ्घते मधुकरः ।
राजा- ननु वार्यतामेष धृष्टः !
विदूषकः – भवानेवाविनीतानां शासितास्य वारणे प्रभविष्यति ।
राजा- युज्यते । अयि भो कुसुमलताप्रियातिथे, किमत्र् परिपतनखेदमनु-
भवसि ?
एषा कुसुमनिषण्णा तृषितापि सतो भवन्तमनुरक्ता ।
प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति ॥१९॥
सानुमती – अद्याभिजातं खल्वेष वारितः ।
विदूषकः – प्रतिषिध्दापि वामैषा जातिः ।
राजा- एवं भो न मे शासने तिष्ठति ? श्रूयतां तर्हि संप्रति;
अक्लिष्टबालतरुपल्लवलोभनीयं
पीतं मया सदयमेव रतोत्सवेषु ।
बिम्बाधरं स्पृशसि चेद्भ्रमर प्रियायाः
त्वां कारयामि कमलोदरबन्धनस्थम् ॥२०॥
विदूषकः – एवं तीक्ष्णदण्डस्य किं न भेष्यति ? (प्रहस्य, आत्मगतम्)
एष तावदुन्मत्तः । अहमप्येतस्य सङ्गेनेदृश वर्ण इव संवृत्तः ।
(प्रकाशम्) भोः चित्रं खल्वेतत् !
राजा- कथं चित्रम् ?
सानुमति – अहमपीदानीमवगतार्था । किं पुनर्यथालिखितानुभाव्येषः ।
राजा- वयस्य, किमिदमनुष्ठितं पौरोभाग्यम् ?
दर्शनसुखमनुभवतः साक्षादिव तन्मयेन हृदयेन ।
स्मृतिकारिणा त्वया मे पुनरपि चित्रीकृता कान्ता ॥२१॥
(इति बाष्पं विहरति)
सानुमती – पूर्वापरविरोध्यपूर्व एष विरहमार्गः ।
राजा- वयस्य, कथमेवमविश्रान्तदुः खमनुभवामि ?
प्रजागरात्खिलीभूतस्तस्याः स्वप्नं समागमः ।
बाष्पस्तु न ददात्येनां द्र्ष्टुं चित्रगतामपि ॥२२॥
सानुमती – सर्वथा प्रमार्जितं त्वया प्रत्यादेशदुःखं शकुन्तलाय ।
(प्रविश्य) – चतुरिका – जयतु जयतु भर्ता । वर्तिकाकरण्डकं गृहीत्वेतोमुखं
प्रस्थितास्मि ।
राजा- किं च ?
चतुरिका – स मे हस्तादन्तरा तरलिकाद्वितीयया देव्या वसुमत्याहमेवार्य-
पुत्रस्योपनेष्यामीति सबलात्कारं गृहीतः ।
विदूषकः – दिष्ट्या त्वं मुक्ता !
 चतुरिका – यावद्देव्या विटपलग्नमुत्तरीयं तरलिका मोचयति तावन्मया निर्वाहित
आत्मा ।
राजा- वयस्य, उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमां प्रतिकृतिं
रक्षतु ।
विदूषकः – आत्मानमिति भण (चित्रफलकमादायोत्थाय च) यदि भवानन्तः-
पुरकूटवागुरातो मोक्ष्यते, तदा मां मेघप्रतिच्छन्दे प्रासादे शब्दापय ।
सानुमती – अन्यसंक्रान्तहृदयोऽपि प्रथम सम्भावनामपेक्षते । अतिशिथिल-
सौहार्द इदानीमेषः ।
(प्रविश्य पत्रहस्ता) प्रतीहारी- जयतु जयतु देवः ।
राजा- वेत्रवती, न खल्वन्तरा दृष्टा त्वया देवी ?
प्रतीहारी – अथ किम् ? पत्र हस्तां मां प्रेक्ष्य प्रतिनिवृत्ता ।
राजा- कार्यज्ञा- कार्योपरोधं मे परिहरति ।
प्रतीहारी – देव, अमात्यो विज्ञापयति- “अर्थजातस्य गणनाबहुलतयैकमेव
पौरकार्यमवेक्षितं; तद्देवः पत्रारुढं प्रत्यक्षीकरोतु” इति ।
राजा- इतः पत्रं दर्शय । (प्रतीहार्युपनयति)
राजा- (अनुवाच्य) कथम् ? समुद्रव्यवहारी सार्थवाहो धनमित्रो नाम
नौव्यसने विपन्नः ! अनपत्यश्च किल तपस्वी ! राजगामी
तस्यार्थसञ्चय इत्येतदमात्येन लिखितम् ।कष्टं खल्वनपत्यता ।
वेत्रवति, बहुधनत्वाद्बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम् ।विचार्यतां
यदि काचिदापन्नसत्वा तस्य भार्यासु स्यात् ।
प्रतीहारी – देव, इदानीमेव साकेतकस्य श्रेष्ठिनो दुहिता निर्वृत्तपुंसवना जायास्य
श्रूयते ।
राजा- ननु गर्भः पित्रयं रिक्थमर्हति ! गच्छ । एवममात्यं ब्रूहि ।
प्रतीहारी – यद्देव आज्ञापयति ।
राजा- एहि तावत् ।
प्रतीहारी – इयमस्मि ।
राजा- किमनेन सन्ततिरस्ति नास्तीति ?
येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन बन्धुना
स स पापादृते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ॥२३॥
प्रतीहारी – एवं नाम घोषयितव्यम् (निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य) काले
प्रवृष्टमिवाभिनन्दितं देवस्य शासनम् ।
राजा-(दीर्घमुष्णं च निः श्वस्य) एवं भो । सन्ततिच्छेदनिरवलम्बना
कुलानां मूलपुरुषावसाने संपदः परमुपतिष्ठन्ति । ममाप्यन्ते
पुरुवंशश्रियः एष एव वृत्तान्तः ।
प्रतीहारी – प्रतिहतममङ्गलम् ।
राजा- धिङ्मामुपस्थितश्रेयोवमानिनम् ।
सानुमती – असंशयं सखीमेव हृदये कृत्वा निन्दितोऽनेनात्मा ।
राजा- संरोपितोऽप्यात्मनि धर्मपत्नी त्यक्ता मया नाम कुलप्रतिष्ठा ।
कल्पिष्यमाणा महते फलाय वसुन्धरा काल इवोप्तबीजा ॥२४॥
सानुमती – अपरिच्छिन्नेदानीं ते सन्ततिर्भविष्यति ।
चतुरिका – आर्य, अनेन सार्थवाहवृत्तान्तेन द्विगुणोद्वेगो भर्ता । एनमाश्वासयितुं
मेघप्रतिच्छन्दादार्यं माधव्य गृहीत्वागच्छ ।
प्रतीहारी – सुष्ठु भणसि ।
राजा- अहो, दुष्यन्तस्य संशयमारुढाः पिण्डभाजः । कुतः;
अस्मात्परं बत यथाश्रुति संभृतानि
को नः कुले निवपनानि नियच्छतीति ।
नूनं प्रसूतिविकलेन मया प्रसिक्तं
धौताश्रुशेषमुदकं पितरः पिबन्ति ॥२५॥
चतुरिका – (ससंभ्रममवलोक्य) समाश्वसितु, समाश्वसितु भर्ता ।
सानुमती- हा धिक् ! हा धिक् ! सति खलु दीपे व्यवधानदोषेणैषोऽन्ध-
कारदोषमनुभवति । अहमिदानीमेव निर्वृतं करोमि ? अथवा,
श्रुतं मया शकुन्तलां समाश्वसन्त्या महेन्द्रजनन्याः
मुखाद्यज्ञभागोत्सुका देवा एव तथानुष्ठास्यन्ति तथाऽचिरेण धर्मपत्नीं
भर्ताभिनन्दिष्य-तीति । तद्युक्तमेतं कालं प्रतिपालयितुम् ।
यावदनेनवृत्तान्तेन प्रियसखीं समाश्वासयामि ।
            (इत्युद्भ्रान्तकेन निष्क्रान्ता)
            (नेपथ्ये) अब्रह्मण्यम् ।
राजा- (प्रत्यागतः कर्णं दत्वा) अये, माधव्यस्येवार्तस्वरः । कः कोऽत्र्
भोः ?
(प्रविश्य) प्रतीहारी – (ससंभ्रमम्) परित्रायतां देवः संशयगतं वयस्यम् ।
राजा- केनात्तगन्धो माणवकः ?
प्रतीहारी – अदृष्टरुपेण केनापि सत्येनातिक्रम्य मेघप्रतिच्छन्दस्य
प्रासादस्याग्रभूमिमारोपितः ।
राजा- (उत्थाय) मा तावत् ममापि सत्वैरभिभूयन्ते गृहाः । अथवा,-
अहन्यहन्यात्मन एव तावज्ज्ञातुं प्रमादस्खलितं न शक्यम् ।
प्रजासु कः केन पथा प्रयातीत्यशेषतो वेदितुमस्ति शक्तिः ॥२६॥
(नेपथ्ये) भो वयस्य, अविहा ! अविहा !
राजा- (गतिभेदेन परिक्रामन्) सखे, न भेतव्यम् ।
(नेपथ्ये) पुनस्तदेव पठित्वा कथं न भेष्यामि ? एष मां कोऽपि
प्रत्यवनतशिरोधरमिक्षुमिव त्रिभङ्गं करोति ।
राजा- (सदृष्टिक्षेपम्) धनुस्तावत् ।
(प्रविश्य शार्ङ्गहस्ता) यवनी- भर्तः । एतध्दस्तावापसहितं
शरासनम् । राजा सशरं धनुरादत्ते ।
(नेपथ्ये)
एष त्वामभिनवकण्ठशोणितार्थी
शार्दूलः पशुमिव हन्मि चेष्टमानम् ।
आर्तानां भयमपनेतुमात्तधन्वा
दुष्यन्तस्तव शरणं भवत्विदानीम् ॥२७॥
राजा- (सरोषम्) कथं मामेवोद्दिशति ? तिष्ठ, तिष्ठ कुणपाशन्, त्वमिदानीं
न भविष्यसि ? (शार्ङ्गमारोप्य)वेत्रवति, सोपानमार्गमादेशय ।
प्रतीहारी- इत इतो देवः (सर्वे सत्वरमुपसर्पन्ति)
राजा- (समन्ताद्विलोक्य) शून्य खल्विदम् ।
(नेपथ्ये)- अविहा ! अविहा ! अहमत्र भवन्तं पश्यामि । त्वं मां न पश्यसि ।
बिडालगृहीतो मूषक इव निराशोऽस्मि जीविते संवृत्तः ।
राजा- भोस्तितस्करिणीगर्वित । मदीयमस्त्रं त्वां द्रक्ष्यति । एष तमिषुं
सन्दधे, -
यो हनिष्यति बध्यं त्वां रक्ष्यं रक्षिष्यति द्विजम् ।
हंसो हि क्षीरमादत्ते तन्मिश्रा वर्जयत्यपः ॥२८॥
(इत्यस्त्रं संधत्ते । ततः प्रविशति विदूषकमुत्सृज्य मातलिः विदूषकश्च )
मातलिः- कृता शरव्यं हरिणा तवासुराः
शरासनं तेषु विकृष्यतामिदम् ।
प्रसादसौम्यानि सतां सुहृज्जने
पतन्ति चक्षूंषि न दारुणाः शराः ॥२९॥
राजा- (ससंभ्रममस्त्रमुपसंहरन्) अये मातलिः ! स्वागतं महेन्द्रसारथे ।
विदूषकः- अहं येनेष्टिपशुमारं मारितः सोऽनेन स्वागतेन अभिनन्द्यते ।
मातलिः- (सस्मितम्) आयुष्मन्, श्रूयतां यदर्थमस्मि हरिणा भवत्सकाशं
प्रेषितः ।
राजा- अवहितोऽस्मि ।
मातलिः- अस्ति कालनेमिप्रसूतिर्दुर्जयोः नाम दानवगणः ।
राजा- अस्ति श्रुतपूर्वं मया नारदात् ।
मातलिः- सख्युस्ते स किल शतक्रतोरजय्य-
स्तस्य त्वं रणशिरसि स्मृतो निहन्ता ।
उच्छेत्तुं प्रभवति यन्न सप्तसप्ति-
स्तन्नैशं तिमिरमपाकरोति चन्द्रः ॥३०॥
स भावनात्तशस्त्र एव इदानीमैन्द्रस्यमारुह्य विजयाय प्रतिष्ठताम् ।
राजा- अनुगृहीतोऽहमनया मघवतः संभावनया । अथ माधव्यं प्रति
भवता किमेव प्रयुक्तम् ?
मातलिः- तदपि कथ्यते ।किञ्चिन्निमित्तादपि मनः सन्तापात् आयुष्मान्
मया विक्लवो दृष्टः । पश्चात्कोपयितुमायुष्मंत्त तथा कृतवान्
अस्मि । कुतः;
ज्वलति चलितेन्धनोऽग्विर्विप्रकृतः पन्नगः फणां कुरुते ।
प्रायः स्वं महिमानं क्षोभात्प्रतिपद्यते जन्तुः ॥३१॥
राजा- (जनान्तिकम्) वयस्य, अनतिक्रमणीया दिवस्पतेराज्ञा । तदत्र
परिगतार्थं कृत्वा मद्वचनादमात्यपिशुनं ब्रूहि ।
त्वन्मतिः केवला तावत्परिपालयतु प्रजाः ।
अदिज्यमिदमन्यस्मिन्कर्मणि व्यापृतं धनुः ॥३२॥ इति ।
विदूषकः – यद्भवानाज्ञापयति । (इति निष्क्रान्तः)
मातलिः- आयुष्मान् रथमारोहतु । (राजा रथारोहणं नाट्यति )
(इति निष्क्रान्तः सर्वे)
इति षष्ठोऽङ्कः